Thursday, 21 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

महाराज दशरथ के जीवन में कमी क्या थी ? जब वे कैकेयी के पास आए तो उन्हें प्रसन्न करने के लिए जो वाक्य उन्होंने कहा वह भक्ति से शून्य बना देने वाला है । वह वाक्य क्या था ? उन्होंने कहा - कैकेयी तुम तो जानती हो कि तुम्हारा मुख चन्द्रमा है और मैं चकोर हूँ । भक्त का लक्षण बताते हुए विनयपत्रिका में तुलसीदासजी भगवान राम से कहते हैं कि मैं चकोर बनना चाहता हूँ । लेकिन चकोर किस चन्द्रमा का बनना चाहते हैं ? वे कहते हैं - हे राम ! चन्द्र तो आप हैं ही मुझे चकोर बना लीजिए । भक्त तो वह है जिसकी दृष्टि निरन्तर श्रीरामचन्द्र के मुख पर लगी हुई है । महाराज श्रीदशरथ भी श्रीरामचन्द्र मुखचन्द्र के चकोर हैं, लेकिन इसके साथ-ही-साथ जब उनके अन्तःकरण में कैकेयी का मुखचन्द्र आता है तो वह भी उन्हें आकर्षित कर लेता है । इसका अभिप्राय यह कि वे चाहे कितने भी बड़े भक्त क्यों न रहे हों, लेकिन उस समय उनका जो व्यवहार है, वह भक्ति से शून्य है । व्यक्ति के जीवन में जब भी ऐसी स्थिति आती है तब भक्तिरूपी सीता उनके जीवन से दूर चली जाती हैं । यह स्वाभाविक ही है । इसी प्रकार लोभ की तीव्र प्रवृत्ति आने पर वैराग्य जीवन से दूर चला जाता है ।

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