जब मन्थरा ने कैकेयी के मन में विद्वेष पैदा कर दिया, तब कैकेयी पूछती हैं - अब क्या करूँ ? मन्थरा याद दिला देती है - बस वे ही दो वरदान, एक लोभ का और एक क्रोध का । लोभ का वरदान यानि - राज्य कौशल्या के बेटे को नहीं, मेरे बेटे को राज्य मिलना चाहिए । और क्रोध का वरदान यानि - केवल इतना ही नहीं कि मेरे बेटे को राज्य मिले, बल्कि इसका पूरा सुख तो तब मिलेगा जब कौशल्या से बदला लूँ, उसके बेटे को राज्य से बाहर निकालकर वन में भेज दूँ । मन्थरा ने भेद-बुद्धि की सृष्टि कर उनके मन में लोभ और क्रोध को उत्पन्न कर दिया । और तब उसका परिणाम यह हुआ कि कैकेयी लोभ और क्रोध से भरकर कोप भवन में जा बैठती हैं । और महाराज दशरथ जब कैकेयी के भवन में पहुँचे तो पता चला कि कैकेयी कोप भवन में बैठी हैं । अब इस समय भी अगर महाराज दशरथ लौट जाते तो बात नहीं बिगड़ती । पर उनमें भी वही दुर्बलता थी - काम की दुर्बलता । वह सामने प्रकट हो गई । वे कैकेयी के सौन्दर्य को देखने की तीव्र लालसा के साथ उसके महल में गए । तो लोभ से भरी हुई कैकेयी कोप भवन में बैठी हुई हैं और जो रही-सही कमी थी वह महाराज श्रीदशरथ ने पूरी कर दी । जब सुना कि कैकेयी कोप भवन में है, तो उनके पैर थरथरा उठे, लेकिन चले जा रहे हैं उधर ही । यह व्यंग्य है । जिधर जाने में डर लगे उधर मत जाइए । डर भी लगे और उधर चलते जाना । डर भी लगे और कुपथ्य भी करे, तो रोग होने का यह महालक्षण है । अतः महाराज दशरथ समझते-बूझते हुए कुपथ्य की ओर बढ़ रहे हैं । बस, वहाँ लोभ और क्रोध तो था ही, दशरथजी काम लेकर आ गए । और इस प्रकार ईश्वर जीवन से दूर चले गए और अयोध्या में सन्निपात का आगमन हुआ । इस सन्निपात को भरतजी जैसे वैद्य ही दूर कर सकते हैं । वे अपने चरित्र के द्वारा बताते हैं कि समाज इस रोग के मूल कारण काम, क्रोध और लोभ पर कैसे विजय प्राप्त करे ।
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