मलिक मोहम्मद जायसी के बारे में एक बात बड़ी प्रसिद्ध है । वे एक बड़े प्रसिद्ध सूफी सन्त थें । उन्होंने पद्मावत नाम का बड़ा सुन्दर काव्य लिखा है । वे बड़े ही कुरूप थे । एक बार वे राजा की सभा में गए, तो उन्हें देखकर सभा के लोगों के होठों पर हँसी खेल गई । प्रत्यक्ष रूप से तो वे लोग नहीं हँसे, पर मुँह दबाकर हँसने लगे । जायसी ने देख लिया और वे भी हँसने लगे । वे तो विष पचाना जानते थे । जो लोग उनकी कुरुपता पर हँस रहे थे, उनसे उन्होंने तुरन्त पूछा - आप लोग मुँह दबाकर क्यों हँस रहे हैं ? अब कौन कहे कि आपकी शक्ल देखकर हँस रहे हैं । किसी को साहस नहीं हुआ कुछ कहने का । तब उन्होंने स्वयं ही पलटकर कह दिया - मैं समझ गया कि आप लोग मुझी पर हँस रहे हैं । लेकिन मैं आप लोगों से पूछता हूँ, 'मोहि का हँससि कि कोहरसि' - मुझ पर हँस रहे हैं कि कुम्हार पर । घड़ा अगर टेढ़ा हो जाय तो घड़े का दोष है कि कुम्हार का ? अगर मैं ईश्वर की रचना हूँ तो कुम्हार ने मुझे जैसा बनाया, वैसा मैं बन गया । आप लोगों को हँसना है तो ईश्वर पर हँसे, घड़े पर क्यों हँस रहे हैं ? इस प्रकार उपहास और उपेक्षा को इतना आनन्द से स्वीकार कर लेना तो सन्त चरित्र की विशेषता है ।
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