गोस्वामीजी काम, क्रोध और लोभ के चित्र को अरण्यकाण्ड में तुलनात्मक रूप से प्रस्तुत करते हैं । वहाँ ज्ञान, भक्ति, वैराग्य - तीनों संकट में दिखाई दे रहे हैं । अयोध्याकाण्ड में तो इनको केवल वन भेज दिया गया, पर अरण्यकाण्ड में क्या दिखाई दे रहा है ? भगवान राम रुदन कर रहे हैं । श्रीसीताजी लंका में बंदिनी हैं । और एक ऐसा भी अवसर आता है कि जब लंका में लक्ष्मणजी मूर्छित हैं । इस प्रकार ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की स्थिति अयोध्या की अपेक्षा दण्डकारण्य में और भी अधिक संकटापन्न है । वहाँ पर भी काम, क्रोध और लोभ - ये तीनों वृत्तियाँ आती हैं और एकीकृत हो जाती हैं । ज्ञान, भक्ति, वैराग्य जीवन से दूर चले जाते हैं ।
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