दण्डकारण्य में शूर्पणखा के काम-क्रोध-लोभ तीनों से मुक्त होकर भगवान राम, सीताजी और लक्ष्मणजी सुरक्षित हैं । पर इसका तात्पर्य यह नहीं कि इतने मात्र से ही बुराई समाप्त हो गई । बुराइयों का भी बड़ा विस्तार है । शूर्पणखा का बड़ा विस्तृत परिवार है । वह अभी हार नहीं मानती, अपने भाई खर और दूषण के पास जाती है । फिर वही क्रम - अयोध्याकाण्ड में मन्थरा की जो भूमिका है - कैकेयी के मन में जिस तरह मन्थरा ने लोभ और क्रोध को जगा दिया, ठीक उसी तरह शूर्पणखा ने यहाँ खर-दूषण के मन में काम और क्रोध की वृत्तियों को जगा दिया । पहले तो यह कहकर वह उनके क्रोध को जगाती है कि उन दो राजकुमारों ने मुझे कुरूप कर दिया है और काम को यह कहकर जगाती है कि उनके साथ एक अत्यंत सुन्दर स्त्री है, जो तुम्हारे योग्य है । इसका परिणाम यह होता है कि वे इस काम की वृत्ति को प्रेरित होकर राम की ओर बढ़ते हैं, पर आगे चलकर जब उनके काम की पूर्ति में रुकावट आई तब क्रोध आ जाता है ।
No comments:
Post a Comment