शूर्पणखा पहले तो काम की सृष्टि करती है, आकर्षित करने के लिए सुन्दर बनकर आती है । माया अर्थात जो वास्तविक नहीं है । जैसा है वैसा न दिखाई देकर भिन्न दिखाई दे । शूर्पणखा सुंदर रूप बनाकर आती है, वह उसका वास्तविक रूप नहीं है - नकली है । और यह भेद तब खुलता है जब वह श्रीराम और लक्ष्मण के बीच पहुँच जाती है । तो शूर्पणखा अभी अपने माया के विस्तार में लगी है । काम का प्रदर्शन करती है और लोभ का प्रलोभन दिखाती है । भगवान राम से कहती है कि मैं विश्वविजेता रावण की बहन हूँ । मुझसे विवाह करके तुम्हें बहुत लाभ होगा । एक लेखक ने तो लिखा है कि राम अगर बुद्धिमान होते तो अवश्य ही शूर्पणखा से विवाह कर लेते । इससे दो राष्ट्रों का मैत्री संबंध हो जाता । पर भगवान राम को न तो शूर्पणखा का सौंदर्य ही आकृष्ट कर पाता है और न लंका के वैभव का प्रलोभन ही । तब वह अपनी अपनी तीसरी वृत्ति को प्रकट करती है । वही क्रम - 'कामात्क्रोधोभिजायते' । शूर्पणखा के अन्तर्मन में तीव्रतम काम-वासना थी और उस वासना का परिणाम यह हुआ कि उसके मन में तीव्रतम क्रोध का उदय हुआ और वह अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गई । काम और प्रलोभन तो आकर्षक होता है पर क्रोध भयावह होता है । सुन्दर-से-सुन्दर व्यक्ति भी जब क्रोधित होता है तो उसकी आकृति बड़ी भयानक हो जाती है । क्रोध से भरी हुई शूर्पणखा अपने भयंकर रूप में प्रकट हो गई और श्रीसीताजी को ही अपने कामनापूर्ति के मार्ग की मूल बाधा समझकर उनको खाने दौड़ी । और तब भगवान राम तुरन्त लक्ष्मणजी को संकेत करते हुए कहते हैं कि अब तुम्हें भक्ति की रक्षा करनी है । तो वैराग्य की दो भूमिकाएँ हैं, एक तो यह कि वह ज्ञान का सदा सहचर है और इसके साथ-ही-साथ वह भक्ति का संरक्षक भी है ।
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