Wednesday, 20 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

श्रीजानकीजी और श्रीलक्ष्मणजी भी श्रीराम के साथ वन जाने के लिए व्यग्र हो जाते हैं । श्रीराम जाएँगे तो सीता और लक्ष्मण भी साथ जाएँगे । ज्ञान ही नहीं रहेगा तो न भक्ति ही रहेगी और न वैराग्य ही । जब रहेंगे तो तीनों साथ ही रहेंगे । उस समय कुछ लोग कहने लगे कि आप लोग मत जाइए । यह सुनकर कैकेयी की मनःस्थिति क्या है ? उनमें क्रोध की तीव्रतम अभिव्यक्ति हुई । क्रोध से भरी हुई कैकेयी तमक उठी, और क्या किया - मुनियों के योग्य वस्त्र, कमण्डलु आदि वस्तुएँ लाकर कैकेयी श्रीराम के सामने लाकर रख देती हैं और उनसे कहती हैं कि राम ! ये लोग तुम्हारे हितैषी नहीं हैं । लोभ की वृत्ति में जो दम्भ की प्रकृति निहित रहती है, वह कैकेयी की भाषा में विद्यमान है । दम्भ का अर्थ है कि मन में कुछ और है और दिखावा कुछ और ही किया जा रहा है । कैकेयी राम का हितैषी होने का दिखावा करती हैं । वे कहती हैं - भोग से त्याग-तपस्या श्रेष्ठ है । मैं तुम्हें तपस्या का अवसर दे रही हूँ, पर ये लोग तुम्हारे मार्ग में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं, इसलिए तुम जितनी शीघ्र हो सके, यहाँ से चले जाओ । कैकेयीजी का यह तीव्र आक्रोश तब तक शान्त नहीं होता जब तक श्रीराम वन नहीं चले जाते । इसका अभिप्राय यह है कि एक बार जहाँ इस क्रोध की, द्वैत की, भेद की वृत्ति आती है, उस समय व्यक्ति के अन्तःकरण से ज्ञान दूर चला जाता है । उस समय राम भी प्रिय  नहीं लगते, ईश्वर भी अप्रिय लगता है ।

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