खर-दूषण ने जब क्रोध में पागल होकर भगवान राम पर आक्रमण कर दिया, तब भगवान ने लक्ष्मणजी से कहा कि राक्षसों की भयंकर सेना आ रही है, सीता की रक्षा का भार मैं तुम्हें सौंपता हूँ । लक्ष्मणजी तुरन्त श्रीसीताजी को लेकर कंदरा में चले जाते हैं । और इसका अर्थ क्या है ? भक्ति का अर्थ ही है राग । भगवान राग की सुरक्षा तो तभी कर सकेंगे जब संसार से वैराग्य होगा । रामायण में वैराग्य की तुलना ढाल से की गयी है । यह ढाल तो अब आप संग्रहालय में ही देख पाएँगे । आजकल तो उसका प्रयोग नहीं होता । यह ढाल बिल्कुल सूखे चमड़े से बनाई जाती थी । इतिहास को पढ़ने से ज्ञात होता है कि प्राचीनकाल में गैंडे के चमड़े से ढाल बनाई जाती थी । गैंडे की खाल अत्यंत कठोर और मोटी होती है । उसे सुखाया जाता था । खाल का रक्त जब पूरी तरह से सूख जाता था तब उसकी ढाल बनाई जाती थी । तो इतनी कठोरता और इतनी शुष्कता का उद्देश्य क्या था ? कोमलता की रक्षा करना । शरीर कोमल है और सामनेवाला शत्रु जब आक्रमण कर दे, तलवार चला दे, तो परिणाम क्या होगा कि रक्त बहने लगेगा और मृत्यु हो जाएगी । तो योद्धा एक ओर तो तलवार से शत्रु पर प्रहार करता है और दूसरी ओर ढाल से अपनी रक्षा करता है । इसका अभिप्राय यह है कि दुर्गुणों के आक्रमण से हमारा राग संसार में बह गया, नष्ट हो गया तो हमारी साधनाशक्ति, प्राणशक्ति समाप्त हो जाएगी । इसलिए वैराग्य की जो नीरसता है, वैराग्य की जो शुष्कता है, वह भक्ति की कोमलता और सरसता की, भक्ति के राग की रक्षा के लिए है । इसलिए लक्ष्मणजी बड़े नीरस लगते हैं, जो उनके लिए शोभा की बात है । लक्ष्मणजी अगर सरस दिखाई न दें, रुखे-सूखे व कठोर प्रतीत हों, तो यह तो वैराग्य की भूमिका के अनुकूल ही है ।
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