Tuesday, 19 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

व्यक्ति के जीवन में अगर काम, क्रोध, लोभ होगा तो उसका अन्तःकरण ज्ञान, भक्ति, वैराग्य से शून्य होगा । ज्ञान का मुख्य संबंध अद्वैत से है । रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड मे यह संकेत किया गया है कि क्रोध तो बिना द्वैत के आता नहीं और अगर किसी व्यक्ति के अन्तःकरण में द्वैत बना हुआ है, तो इसका अर्थ यही है कि उसके अन्तःकरण में अज्ञान है । जब तक कैकेयी के अन्तःकरण में श्रीराम और श्रीभरत में भेदवृत्ति नहीं थी, तब तक श्रीराम और श्रीभरत उन्हें प्राप्त थे । लेकिन ज्योंही श्रीराम और श्रीभरत में भेदवृत्ति उत्पन्न हुई तो परिणाम स्वरूप उनके अन्तःकरण में क्रोध उत्पन्न हुआ जिसके फलस्वरूप उनमें यह वृत्ति आ गई कि श्रीराम यहाँ से जितनी जल्दी चले जाएँ, उतना ही अच्छा । कैकेयी ने महाराज दशरथ से जो दो वरदान माँगे उनका क्रम इस प्रकार था - पहला राज्य भरत को दिया जाय और दूसरा श्रीराम चौदह वर्ष के लिए वन में निवास करें । तो वरदान इस क्रम से माँगा गया था कि पहले भरत का राज्याभिषेक हो और बाद में राम का वनवास । भरत को राज्य अर्थात अपने पुत्र को सुख और राम को वनवास यानि जिसे वे पराया मानती हैं उसे दुख मिले । लेकिन उनमें इतना तीव्र आक्रोश है कि वे कह देती हैं कि भरत को राज्य मिलने में कुछ विलम्ब हो जाय तो मुझे सह्य है, पर राम के वनवास में अगर विलम्ब हुआ तो मैं नहीं सह सकती । यह है क्रोध की प्रतिक्रिया । इसका अभिप्राय यह है कि हमें सुख मिलने में चाहे देर लगे पर दूसरों को दुःख मिलने में देर बिल्कुल न हो ।

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