गोस्वामीजी एक तुलनात्मक चित्र प्रस्तुत करते हैं । एक ओर लंका है और दूसरी ओर अयोध्या । लंका को हम पाप की नगरी के रूप में देखते हैं और अयोध्या को पुण्य की नगरी के रूप में । वैसे अगर शाश्वत दृष्टि से देखा जाए तो भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में ही किसी का ह्रदय अयोध्या के समान होता है तो किसी का लंका के समान । जहाँ ह्रदय लंका के समान होता है वहाँ स्वाभाविक रूप से असंतुलन का ही राज्य होता है । वहाँ काम, क्रोध और लोभ की वृत्तियाँ ही राज्य करती हैं । लेकिन अयोध्या जैसे ह्रदय में भी यह असंतुलन उत्पन्न होता है । बुरे व्यक्ति के ह्रदय में तो काम, क्रोध और लोभ निरन्तर सक्रिय रहते ही हैं पर भले कहे जाने वाले व्यक्ति के जीवन में भी इनके उद्भव की सम्भावना है । जब व्यक्ति के मन में इन दुर्गुणों का उद्भव होता है तब उसका क्या परिणाम होता है ? जब मन्थरा के द्वारा कैकेयीजी के अन्तःकरण में क्रोध और लोभ की विकृति उत्पन्न की जाती है और महाराज दशरथ काम की वृत्ति लेकर कैकेयी के भवन में जाते हैं ? तब इन त्रिदोषों के उदय के परिणाम स्वरूप तीन वस्तुएँ जीवन से दूर चली जाती हैं । दोनों ओर तीन-तीन हैं । जब काम, क्रोध और लोभ हमारे जीवन में आते हैं तो भगवान श्रीराम, सीताजी और लक्ष्मण जीवन से दूर चले जाते हैं ।
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