Sunday, 24 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

दण्डकारण्य में लक्ष्मणजी ने भगवान राम से कुछ प्रश्न किए । लक्ष्मणजी पूछते हैं - ब्रह्म क्या है, जीव क्या है, माया क्या है, ज्ञान क्या है, वैराग्य क्या है, भक्ति क्या है ? जब लक्ष्मणजी ने एक साथ इतने प्रश्न रख दिए तो भगवान राम ने कहा - थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई । - लक्ष्मण ! मैं थोड़े में ही सब कह रहा हूँ । लक्ष्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ । प्रश्न मेरा इतना विस्तृत और उत्तर संक्षेप में क्यों ? भगवान राम का तात्पर्य था कि लक्ष्मण ! भाषण दूँगा संक्षेप में और दिखलाऊँगा विस्तार में । अभिप्राय यह है कि आगे चलकर जितनी घटनाएँ होती हैं वे सब मानो लक्ष्मणजी के प्रश्नों के ही उत्तर के लिए हैं । लक्ष्मणजी जिस ज्ञान, वैराग्य, माया और भक्ति का लक्षण जानना चाहते थे उसे भगवान श्रीराघवेन्द्र ने शब्दों के द्वारा तो संक्षेप में कहा पर बाद में प्रत्यक्ष दिखा दिया । शूर्पणखा जब भगवान के पास आई तो उन्होने उसे लक्ष्मण के पास भेज दिया । लक्ष्मणजी ने भगवान से पूछा था कि माया का लक्षण क्या है । तो मानो भगवान राम का यह संकेत था कि लो, माया को प्रत्यक्ष भेज रहा हूँ, सुनकर शायद उतना नहीं समझ पाते जितना प्रत्यक्ष देखकर समझ सकोगे । यह प्रत्यक्ष अविद्या माया है ।

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