Friday, 15 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

हम मन्थरा और कैकेयी के संदर्भ में देखें तो यहाँ पर भी काम, क्रोध और लोभ तीनों है । तीनों को एक तरह से जोड़ा गया है । ज्ञान की दृष्टि से भी, भक्ति की दृष्टि से भी और कर्म की दृष्टि से भी - तीनों दृष्टियों से उसने अयोध्या में इतनी प्रतिकूलता की सृष्टि कर दी कि काम, क्रोध और लोभ - तीनों एकत्रित हो गए । अब आप ध्यान से देखें कि मन्थरा क्या करने जा रही है ? कैकेयी के मन में तो राम के प्रति कोई क्रोध नहीं था । मन्थरा ने जब कहा कि राम को राज्य मिलने वाला है, तो कैकेयी प्रसन्न हो उठती है । मन्थरा जानती थी, उसने तय कर लिया था कि जब तक मैं इनकी बुद्धि में भेद नहीं उत्पन्न करूँगी, तब तक इनको राम के प्रति द्वेष नहीं होगा, क्रोध नहीं आयेगा - 'क्रोध कि द्वैत बुद्धि बिनु', और तब तक मेरी योजना सफल नहीं होगी । और अविलम्ब उसने अपनी भूमिका प्रारंभ कर दी । उसने कैकेयी को याद दिलाया - जानती हो राम किसके बेटे हैं । कैकेयी के मन में भेद नहीं है, उसके लिए श्रीराम और भरत समान हैं । पर यहीं भेद बुद्धि की प्रतीक - मन्थरा, दोनों में भेद उत्पन्न करने की चेष्टा करती है । पर कैकेयी कहती है - नहीं नहीं, मन्थरा ! राम तो मुझे अपनी माँ से भी अधिक चाहते हैं । इस पर मन्थरा ने तुरन्त कुटिलतापूर्ण सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि बिल्कुल ठीक कहती हो । राम पहले कौशल्या जी से अधिक तुम्हें चाहते थे । वह बड़ी सावधानी से बढ़ रही थी, कैकेयी की बात उसने काटी नहीं, बल्कि कहती हैं कि आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं लेकिन आपको पता है ? यह पुराना समाचार है । वह जो बात पहले थी, वे दिन अब बीत गए । समय फिर जाने पर मित्र भी शत्रु हो जाते हैं । सूर्य कमल के कुल का पालन करनेवाला है, पर बिना जल के वही सूर्य उन कमलों को जलाकर भस्म कर देता है । कौशल्या तुम्हारी सौत है । वह तुम्हारे सौभाग्य को नष्ट करने पर तुली हुई है । अपने बेटे को सिंहासन पर बैठाकर तुम्हें संकट में डालना चाहती है । इस प्रकार मन्थरा ने कैकेयी के मन में विद्वेष पैदा कर दिया ।

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