गोस्वामीजी कहते हैं कि रामराज्य होने वाला है । चारों ओर नगर सजाया जा रहा है । मन्थरा अचानक पूछ बैठती है कि नगर क्यों सजाया जा रहा है ? लोगों ने कहा - क्या तुम्हें पता नहीं ? श्रीराम का राज्याभिषेक होने वाला है । यह सुनकर मन्थरा को बड़ा बुरा लगा कि इतनी तैयारियाँ चल रही हैं, बाहर के सब लोगों को मालुम हो चुका और मुझे अभी तक पता नहीं । मुझसे छुपाया गया है । मेरी उपेक्षा की गयी है । तब उसकी सन्देह की वृत्ति जाग उठी - जरूर कोई षड्यंत्र की योजना है । और तब उसमें रोग आ गया । कौन-सा रोग ? मानस-रोगों के संदर्भ में गोस्वामीजी ने कहा है - अगर दूसरों के सुख को देखकर जलन होने लगे तो समझ लेना चाहिए कि मन का राजयक्ष्मा हो गया है । तपेदिक या टी बी हो गयी है । मन्थरा तो पहले ही अस्वस्थ थी, हीनता की वृत्ति से ग्रस्त थीं, अब यह राजयक्ष्मा भी आ गया । जब व्यक्ति मन के राजयक्ष्मा से ग्रस्त हो जाता है, तब वह दूसरों के सुख को देखकर जलने लगता है । तब उसके सामने दो ही उपाय होते हैं - या तो वह स्वयं पुरूषार्थ करके सुख प्राप्त करने की चेष्टा करता है या दूसरों के सुख को छीनने की चेष्टा करता है, दूसरे को सुख से वंचित करने की चेष्टा करता है ।
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