Friday, 30 September 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

गोस्वामीजी दोहावली रामायण में कहते हैं कि एक तो जहाँ ममता हो वहाँ से मन को हटा लेना चाहिए और ऐसा न हो सके तो क्या उपाय है - या तो ममता राम पर करो या ममता का त्याग करो । तात्पर्य यह है कि ममता अगर ससीम पर होगी तो उसके खण्डित होने पर वह दुख देगी । भले ही वह प्रारंभ में सुख दे, पर बाद में दुख दिए बिना नहीं रहेगी । लेकिन यदि हमारा ममता का केन्द्र नित्य होगा, अखण्ड होगा, तो वह हमारे जीवन में केवल सुख की सृष्टि करेगी, दुख की कभी नहीं । इसलिए श्रीलक्ष्मण परशुरामजी से कहते हैं - 'एहि धनु' - उनका यह शब्द बड़े महत्व का है । कहते हैं - महाराज, यह धनुष तो आप देख ही रहे हैं, टूटा हुआ पड़ा है । इसका अर्थ तो यही हुआ कि आपने अपने मन में यह मान लिया था कि यह धनुष कभी नहीं टूटेगा, कभी नहीं मिटेगा । यह आपकी भ्रांति थी । कोई वस्तु बहुत दिनों तक टिकती है तो कोई जल्दी नष्ट हो जाती है । यह काल तो सत्य है । और लक्ष्मणजी कौन हैं ? ये तो स्वयं काल हैं और वैराग्य ही इनकी भूमिका है । काल के सत्य पर दृष्टि जाते ही वैराग्य का उदय होता है और वैराग्य से ही ममता की निवृत्ति होती है । इस प्रकार भगवान राम ने अखण्ड-ज्ञान के रूप में परशुरामजी को अहंता से निवृत्त किया और कालरूप लक्ष्मणजी ने वैराग्य की भूमिका द्वारा उन्हें ममता से मुक्त होने की प्रेरणा दी ।

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