महत्वकांक्षा का पहला रूप सामने यह आया कि विन्ध्याचल ने सूर्य से कहा कि तुम मेरी भी परिक्रमा किया करो, मैं कोई कम हूँ क्या ? सूर्य ने कहा - मैं तो नियम से बँधा हुआ हूँ, इसलिए तुम्हारे कहने से तुम्हारी परिक्रमा नहीं कर सकता । अब देखिए, महत्वकांक्षा में विकृति आ गयी ? सूर्य से प्रकाश लेना एक बात है और सूर्य हमारी परिक्रमा करे, यह दूसरी बात है । अपनी महत्वकांक्षा के लिए हम प्रकाश जीवन में लें और प्रकाश का सदुपयोग करके हम आगे बढें, तब तो हमारी महत्वकांक्षा हमको सही दिशा में ले जायेगी पर अगर हम यह समझने लगें कि प्रकाश हमारे चारों ओर ही चक्कर काटने लगे, इसका अभिप्राय तो यही है कि हम केवल अपने को ही चमकाना चाहते हैं । और उसकी विकृति इस रूप में आ गयी कि जब सूर्य ने अस्वीकार कर दिया तो विन्ध्याचल ने कहा कि अगर तुम मेरी परिक्रमा नहीं करोगे तो तुम्हारे प्रकाश से मैं संसार को वंचित करके अंधकार फैला दूँगा । मात्सर्य का सबसे बुरा रूप यही है ।
Saturday, 31 December 2016
Friday, 30 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
.....कल से आगे.....
इतिहास और भूगोल की एक दृष्टि यह है कि इतिहास में 'काल' को बड़ा महत्व दिया जाता है, और भूगोल में 'स्थान' को बड़ा महत्व प्राप्त है । पर हमारे आध्यात्मिक जगत में इतिहास और भूगोल का उपयोग मानव-जीवन के जो तात्विक अर्थ हैं उनको ग्रहण करने के लिए किया गया । वैसे हिमालय और विन्ध्याचल की भौतिक अवस्थिति से तो आप परिचित ही हैं । पर हिमालय और विन्ध्याचल का आध्यात्मिक अर्थ जो रामायण में किया गया है वह बड़ा सांकेतिक है और पुराणों से जुड़ा हुआ है । विन्ध्याचल की कथा जो पुराणों में आती है वह बड़े महत्व की है । विन्ध्याचल को जब यह पता चला कि सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करता है तो उसके मन में भी महत्वकांक्षा जागी । व्यक्ति के अन्तःकरण की जो महत्वकांक्षा है वही वस्तुतः विन्ध्याचल का रूप है । और यह महत्वकांक्षा दो रूपों में रामायण में वर्णित है । इस प्रसंग में प्रश्न यह है कि महत्वकांक्षा होनी चाहिए कि नहीं ? विन्ध्याचल की यात्रा करनी चाहिए कि नहीं ? तो भई ! यह कहना तो बड़ा सरल है कि व्यक्ति महत्वकांक्षा छोड़ दे । पर व्यवहार में उसे उतार पाना सरल नहीं है । वैसे महत्वाकांक्षा के दोनों प्रकार के परिणाम हमें दिखायी देते हैं अगर महत्वाकांक्षा गलत दिशा में मुड़ जाय तो व्यक्ति प्रतापभानु की तरह रावण बन जायेगा और यदि महत्वकांक्षा को सही दिशा मिल जाय तो व्यक्ति भक्त, संत और भगवान का अभिन्न अंश भी बन सकता है ।
इतिहास और भूगोल की एक दृष्टि यह है कि इतिहास में 'काल' को बड़ा महत्व दिया जाता है, और भूगोल में 'स्थान' को बड़ा महत्व प्राप्त है । पर हमारे आध्यात्मिक जगत में इतिहास और भूगोल का उपयोग मानव-जीवन के जो तात्विक अर्थ हैं उनको ग्रहण करने के लिए किया गया । वैसे हिमालय और विन्ध्याचल की भौतिक अवस्थिति से तो आप परिचित ही हैं । पर हिमालय और विन्ध्याचल का आध्यात्मिक अर्थ जो रामायण में किया गया है वह बड़ा सांकेतिक है और पुराणों से जुड़ा हुआ है । विन्ध्याचल की कथा जो पुराणों में आती है वह बड़े महत्व की है । विन्ध्याचल को जब यह पता चला कि सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करता है तो उसके मन में भी महत्वकांक्षा जागी । व्यक्ति के अन्तःकरण की जो महत्वकांक्षा है वही वस्तुतः विन्ध्याचल का रूप है । और यह महत्वकांक्षा दो रूपों में रामायण में वर्णित है । इस प्रसंग में प्रश्न यह है कि महत्वकांक्षा होनी चाहिए कि नहीं ? विन्ध्याचल की यात्रा करनी चाहिए कि नहीं ? तो भई ! यह कहना तो बड़ा सरल है कि व्यक्ति महत्वकांक्षा छोड़ दे । पर व्यवहार में उसे उतार पाना सरल नहीं है । वैसे महत्वाकांक्षा के दोनों प्रकार के परिणाम हमें दिखायी देते हैं अगर महत्वाकांक्षा गलत दिशा में मुड़ जाय तो व्यक्ति प्रतापभानु की तरह रावण बन जायेगा और यदि महत्वकांक्षा को सही दिशा मिल जाय तो व्यक्ति भक्त, संत और भगवान का अभिन्न अंश भी बन सकता है ।
Thursday, 29 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
भगवान श्रीराघवेन्द्र ने मार्ग के संबंध में जिज्ञासा कहाँ और किससे की वह बड़े महत्व की बात है । भगवान श्रीराम के समक्ष चित्रकूट यात्रा का प्रश्न है और चित्रकूट जो है वह विन्ध्याचल का एक अंग है और प्रतापभानु के जीवन की जो यात्रा थी वह भी विन्ध्याचल की ही यात्रा थी । इस प्रकार दोनों की यात्राएँ विन्ध्याचल की हैं । रामायण में वर्णन आता है कि सारे संसार पर अधिकार कर लेने के पश्चात प्रतापभानु के मन में एक दिन विन्ध्याचल की यात्रा का संकल्प जाग्रत हुआ । विन्ध्याचल पर्वत में तथा उसके आसपास सघन वन है । गोस्वामीजी कहते हैं - प्रतापभानु जो था वह विन्ध्याचल के गम्भीर वन में गया और यहाँ पर भगवान श्रीराम की यात्रा भी विन्ध्याचल की ओर ही है तथा चित्रकूट भी वन ही है पर इसके सांकेतिक अर्थ क्या है ? आने वाले दिनों में हम इस पर विचार करेंगे ।
......आगे कल.....
......आगे कल.....
Wednesday, 28 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
जो व्यक्ति रावण बन गया वह कौन था ? इस पर यदि आप विचार करें तो आपको लगेगा कि जो व्यक्ति जीवन पथ से भटक गया वही रावण बन गया और वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं था । क्योंकि प्रतापभानु अपने सद्गुणों की दृष्टि से, अपने चरित्र की दृष्टि से महान था । वह भी चला, पर चलने के बाद भटक गया । कैसे भटक गया, इसका वर्णन करते हुए गोस्वामीजी कहते हैं - कैकेय देश में सत्यकेतु नाम के राजा थे । उन सत्यकेतु राजा के दो पुत्र हुए, प्रतापभानु और अरिमर्दन । सत्यकेतु ने वृध्दावस्था में राज्य का परित्याग कर दिया और श्रेष्ठ पुत्र प्रतापभानु को गद्दी पर बैठा दिया । प्रतापभानु सिंहासन पर बैठा और धर्मपूर्वक राज्य का संचालन करने लगा - उसके राज्य में ऐसा लगने लगा कि जैसे धर्मराज्य की स्थापना हो गई हो । प्रतापभानु इतना धार्मिक राजा, इतना महान चरित्र वाला व्यक्ति था । परन्तु जब यह कहा जाता है कि आगे चलकर वही रावण हो गया तो बड़ी निराशा होती है । किन्तु उस प्रसंग को ध्यान से पढ़ें तो एक बड़ा अनोखा संकेत सूत्र यह दिया गया है कि संसार में आज जो पक्षी दिखायी देते हैं उसमें कौए और हंस अलग-अलग दिखाई देते हैं । उनमें परिवर्तन करने का कोई उपाय नहीं है । कौआ, कौआ ही रहेगा और हंस, हंस ही । लेकिन मनुष्य के जीवन की विलक्षणता है कि उसमें परिवर्तन होता है । प्रतापभानु के जीवन में जब परिवर्तन हुआ तो उसको देखकर सब लोगों ने ब्रह्मा को दोष देते हुए यही कहा कि ब्रह्मा ने हंस का निर्माण करते-करते अचानक कौए का निर्माण कर दिया है । परन्तु ऐसा क्यों हो गया ? तो उसका जो चित्र गोस्वामीजी ने प्रस्तुत किया है, उसका भी सूत्र यही है कि प्रतापभानु मार्ग से भटक गया था ।
Tuesday, 27 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
गोस्वामीजी कहते हैं कि भगवान राम की जो चित्रकूट यात्रा है उसमें जिस क्रम से भगवान श्रीराम जिज्ञासा प्रकट करते हैं, तथा उसके बाद जिस क्रम से यात्रा करते हैं, हम और आप भी अगर उसी क्रम से जिज्ञासा करते हुए उस पथ पर चलें, जिस पर वे तीनों यात्री चले थे तो गोस्वामीजी विश्वास दिलाते हैं कि आप भगवान श्रीराम के धाम का मार्ग अवश्य प्राप्त कर लेंगे । श्रीराम कौन हैं ? वसिष्ठ जी ने उनके नाम का अर्थ बताते हुए कहते हैं - जो आनंद का समुद्र है, जो सुख की मूर्तिमान निधी है, जो समस्त प्राणियों को विश्राम देने वाला है, वही राम है । इसका अभिप्राय है कि एक यात्रा पथ वह है जिससे चलकर व्यक्ति श्रीराम से मिलकर रामत्व को पा लेता है । रामधाम का अर्थ राम में एकत्व पा लेना है । और दूसरी ओर एक यात्रा वह भी है जिस यात्रा के प्रारंभ में यात्री मनुष्य रूप होते हुए भी उस पथ पर चलते हुए राक्षस बन जायेगा, रावण बन जायेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है । इन दोनों मार्गों की तुलना करके गोस्वामीजी मानो संकेत देना चाहते हैं कि हम चाहें तो या तो प्रथम मार्ग को स्वीकार करके रामत्व की दिशा में बढ़ें या मनुष्य से रावणत्व की दिशा में बढ़ें, राक्षसत्व की दिशा में बढें । अब यह तो हमें और आपको निर्णय करना है कि हम कौन सा मार्ग अपने लिए चुनते हैं ।
Monday, 26 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
विगत कुछ दिनों से जो प्रसंग आपके सामने चल रहा है, यह भगवान श्रीराम की यात्रा का है, परन्तु रामचरितमानस में एक यात्रा और आती है जिसका वर्णन बालकाण्ड में किया गया है । रावण की कथा जब हम पढ़ते हैं तो उसके पाप का, अत्याचार का, राक्षसत्व का वर्णन पढ़ने को मिलता है तो विचित्र सा लगता है, क्योंकि आपने उसके मूल चरित्र पर अगर ध्यान दिया होगा तो आप यह देखेंगे कि रावण प्रतापभानु के रूप में मूलतः मनुष्य था और यही मनुष्य राक्षस हो गया । मनुष्य का राक्षस हो जाना केवल त्रेतायुग का ही सत्य नहीं है बल्कि आज भी इस संसार में जो राक्षस आते हैं वे मनुष्य से ही राक्षस बनकर आते हैं । और मनुष्य राक्षस तब बन जाता है जब वह अपने पथ से भटक जाता है ।
Sunday, 25 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
जब नारद को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने निर्णय किया कि मैं भगवान के पास बैकुंठ चलूँगा, तब भगवान नारद को बीच रास्ते में रोक देते हैं, कि नारद ! सही लक्ष्य तक पहुँचने की इच्छा ही यथेष्ट नहीं है, इसके साथ-साथ व्यक्ति के जीवन में सही मार्ग की भी आवश्यकता है । मुझे लगता है कि तुम्हारा लक्ष्य बुरा नहीं है, पर तुम मार्ग से भटक गये हो । इसके पश्चात भगवान देवर्षि नारद से वार्तालाप करके उनको वहीं से लौटा देते हैं । इसका अभिप्राय है कि जीवन में किसी भी व्यक्ति का लक्ष्य बुरा नहीं है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति जीवन में सुख पाना चाहता है, शान्ति पाना चाहता है, परमानन्द पाना चाहता है । इसमें तो कोई भेद नहीं है पर उन्हें प्राप्त करने के लिए जिन साधनों का हम प्रयोग करते हैं उनसे अगर सुख के स्थान पर दुख का अनुभव हो रहा है तो इसका अर्थ हमें यही लेना चाहिए कि शायद हम सही मार्ग पर नहीं हैं और इस बात का हमें अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि इतना विलम्ब लगने पर भी अगर हम लक्ष्य तक नहीं पहुँच पा रहे हैं तो हमारा कर्तव्य है कि किसी मार्ग के विशेषज्ञ महापुरुष के चरणों का आश्रय लेकर हम उनसे पूछें कि मेरे लिए उपयुक्त मार्ग कौन-सा है ? यह कृपा करके बताइए ।
Saturday, 24 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
...कल से आगे......
रामायण में बताया गया है कि यद्यपि संसार में अनेक श्रेष्ठ मार्ग हैं पर चार प्रकार के मार्ग और भी हैं, और वे चार मार्ग हैं - काम, क्रोध, मद और लोभ के । लेकिन इन विकारों की सड़कें कहाँ ले जाती हैं ? तो इसका उत्तर देते हुए बताया गया कि अगर कोई नर्क तक पहुँचना चाहता हो तो उसे काम, क्रोध, मद और लोभ की सड़क से यात्रा करनी चाहिए । नारद जी इस समय क्रोध से भरे हुए हैं इसका अर्थ हुआ कि वे क्रोध के मार्ग पर चल रहे हैं । भगवान ने व्यंग्य भरे स्वर में पूछा - महाराज ! आप इस नरक वाली सड़क पर कैसे चले जा रहे हैं ? यह तो बैकुंठ वाली सड़क नहीं है । क्रोध लेकर कोई बैकुंठ में थोड़े ही जाता है ? अन्तःकरण के दोष जब मिट जाते हैं तब व्यक्ति बैकुंठ में प्रवेश पाता है । तो दोषों को छोड़कर जिस लोक में पहुँचा जाता है वहाँ पर आप इन मार्गों से नहीं जा सकते । अभी आप विश्वमोहिनी को पाने की चेष्टा की तो आप काम के मार्ग पर चल रहे थे और इस समय जब आप क्रोध से तमतमा रहे हैं, आपकी भौंहें फड़क रही हैं, तो आप क्रोध के मार्ग से चल रहे हैं । इसी से मैं समझ गया कि आप स्वस्थ नहीं हैं, क्योंकि अगर स्वस्थ होते तो आप कदापि इस मार्ग से बैकुंठ जाने का प्रयास नहीं करते ।
रामायण में बताया गया है कि यद्यपि संसार में अनेक श्रेष्ठ मार्ग हैं पर चार प्रकार के मार्ग और भी हैं, और वे चार मार्ग हैं - काम, क्रोध, मद और लोभ के । लेकिन इन विकारों की सड़कें कहाँ ले जाती हैं ? तो इसका उत्तर देते हुए बताया गया कि अगर कोई नर्क तक पहुँचना चाहता हो तो उसे काम, क्रोध, मद और लोभ की सड़क से यात्रा करनी चाहिए । नारद जी इस समय क्रोध से भरे हुए हैं इसका अर्थ हुआ कि वे क्रोध के मार्ग पर चल रहे हैं । भगवान ने व्यंग्य भरे स्वर में पूछा - महाराज ! आप इस नरक वाली सड़क पर कैसे चले जा रहे हैं ? यह तो बैकुंठ वाली सड़क नहीं है । क्रोध लेकर कोई बैकुंठ में थोड़े ही जाता है ? अन्तःकरण के दोष जब मिट जाते हैं तब व्यक्ति बैकुंठ में प्रवेश पाता है । तो दोषों को छोड़कर जिस लोक में पहुँचा जाता है वहाँ पर आप इन मार्गों से नहीं जा सकते । अभी आप विश्वमोहिनी को पाने की चेष्टा की तो आप काम के मार्ग पर चल रहे थे और इस समय जब आप क्रोध से तमतमा रहे हैं, आपकी भौंहें फड़क रही हैं, तो आप क्रोध के मार्ग से चल रहे हैं । इसी से मैं समझ गया कि आप स्वस्थ नहीं हैं, क्योंकि अगर स्वस्थ होते तो आप कदापि इस मार्ग से बैकुंठ जाने का प्रयास नहीं करते ।
Friday, 23 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
देवर्षि नारद के प्रसंग में सबसे पहले संग से कामना उत्पन्न हुई, उसके पश्चात अत्यंत क्रोध आया और तब उन्होंने निर्णय किया कि मैं भगवान के पास चलूँगा - इतना सोचकर वे भगवान के पास तीव्र गति से चले । वैसे, पहली बार जब नारद गये थे तो बैकुंठ लोक में ही भगवान मिले थे और अब भी भगवान उनको बैकुंठ में ही मिल सकते थे, पर वहाँ पर लिखा हुआ है कि - नारद जी को बीच मार्ग में ही भगवान खड़े हुए मिल गये । यहाँ बीच में मिलने की क्या आवश्यकता थी ? नारद उतावले हो रहे थे, यह तो समझ में आता है, पर भगवान को ऐसी क्या शीघ्रता थी ? और इतना ही नहीं भगवान का प्रश्न तो और भी विचित्र था । भगवान ने नारद को प्रणाम करके जब उनसे प्रश्न किया तो नारद के क्रोध की सीमा नहीं रही । भगवान ने नारद जी से कहा - महाराज ! आप कहाँ जा रहे हैं ? और एक शब्द उसके साथ जुड़ा हुआ था कि आप जा तो रहे हैं, यह तो मैं देख रहा हूँ, पर आपको देखकर ऐसा लग रहा है कि आप कुछ अस्वस्थ हैं, व्याकुल हैं । अब तो नारद का क्रोध चौगुना बढ़ गया कि मुझे बंदर की आकृति इन्होंने दी, मेरा विवाह इन्होंने होने नहीं दिया, और यह भी जानते हैं कि मैं इन्हीं के पास चलकर जा रहा हूँ पर इतने भोले बनकर पूछ रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं कि जैसे इन्हें कुछ पता ही न हो । परन्तु भगवान का बीच मार्ग मिलकर प्रश्न करने का अभिप्राय यह था कि जैसे आपको पता हो कि आपका कोई प्रिय व्यक्ति मार्ग भूल गया हो और वह भटककर गलत दिशा में जा रहा हो तो आप उसे बीच मार्ग में ही मिलें, क्योंकि ऐसा न होने पर वह बड़ी लम्बी यात्रा करके भटक कर न जाने कहाँ चला जायेगा ? तो उचित यही होगा कि आप ही उस तक पहुँच जायँ । इसलिए भगवान स्वयं ही नारद के पास पहुँच गये और उनसे प्रश्न पूछने में व्यंग्य यह था कि नारद ! तुम बैकुंठ लोक में जाना चाहते हो, मुझ तक पहुँचना चाहते हो यह तो मैं जानता हूँ, पर जिस सड़क से तुम जा रहे हो क्या सचमुच यह सड़क बैकुंठ लोक तक जाती है ?
.....आगे कल ....
.....आगे कल ....
Thursday, 22 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
शीलनिधि राजा ने जब अपनी कन्या विश्वमोहिनी का हाथ देखने के लिए नारद जी से कहा और विश्वमोहिनी का हाथ उन्होंने देखा तो उनके अन्तःकरण में वासना और कामना का जन्म हो गया । बाद में एक बार देवर्षि नारद ने भगवान पर मीठा उलाहना देते हुए कहा - प्रभु ! संसार में इतने व्यक्ति विवाह करते हैं, आप किसी के विवाह में बाधा नहीं देते हैं, परन्तु मेरे विवाह में बाधा देना आपको आवश्यक क्यों लगा ? प्रभु ने कहा - नारद ! विवाह का अर्थ है पाणिग्रहण संस्कार । जिसमें वर कन्या का हाथ पकड़ता है । भगवान ने व्यंग्य भरे स्वर में कहा कि जब तुमने हस्तरेखा देखने के लिए केवल कुछ क्षणों के लिए ही पाणिग्रहण किया तब तो तुम्हारी ऐसी शोचनीय स्थिति हो गयी, पर अगर तुम जीवन भर के लिए पाणिग्रहण करते तो न जाने क्या होता ? इसलिए मुझे लगा कि तुम्हें इस संस्कार से बचाया जाय ।
Wednesday, 21 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
जीवन पथ में सही मार्ग के निर्धारण के संदर्भ में देवर्षि नारद के प्रसंग में एक बड़ी व्यंग्यात्मक बात आती है । देवर्षि नारद विश्वमोहिनी को पाने के लिए जब व्यग्र हो जाते हैं तब उनमें कामना का उदय होता है । हम यों कह सकते हैं कि उस प्रसंग का उद्देश्य श्रेष्ठ व्यक्ति के जीवन में भी भटकाव आने की सम्भावना की ओर संकेत करना है । विश्वमोहिनी का सौन्दर्य देखकर नारद उसे पाने के लिए व्यग्र हो जाते हैं । पर जब वे उसे पाने की चेष्टा में सफल नहीं होते, तब उनके अन्तःकरण में अत्यंत क्रोध उत्पन्न होता है । यद्यपि देवर्षि नारद के जीवन की तो यह क्षणिक गाथा है, पर हमारे और आपके जीवन का यह निरन्तर घटित होने वाला सत्य है । मानसिक मनोभाव एक के बाद दूसरे कैसे आते हैं इसको ओर संकेत करते हुए गीता में भगवान कृष्ण ने कहा कि संग से जब कामना उत्पन्न होती है तो उसके दो परिणाम होते हैं यदि कामना की पूर्ति हो जाय तो व्यक्ति के जीवन में लोभ बढ़ेगा और यदि कामना की पूर्ति में बाधा पड़े तो व्यक्ति को क्रोध आयेगा । वैसे गीता में उसे लोभ का नाम नहीं दिया गया, केवल यही कहा गया कि संग से कामना उत्पन्न होती है और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है । लोभ को छोड़ देने का महत्वपूर्ण तात्पर्य यह है कि कामना के बाद मनुष्य को क्रोध आये बिना रहेगा ही नहीं । क्योंकि कामना के बाद मनुष्य का लोभ बढ़ेगा और कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता जिसके जीवन में सम्पूर्ण लोभ की पूर्ति हो जाय । इसलिए भगवान कृष्ण ने यह कहना ज्यादा उचित माना कि संग से कामना और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है । देवर्षि नारद के प्रसंग में हमें इसी क्रम का परिचय मिलता है ।
Tuesday, 20 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
तीर्थराज प्रयाग में महर्षि भरद्वाज से बड़े ही प्रेम भरे शब्दों में प्रभु ने पूछा कि कृपा करके बताइए कि मैं किस मार्ग से जाऊँ ? भगवान श्रीराघवेन्द्र का यह प्रश्न केवल भौतिक प्रश्न ही नहीं है, क्योंकि भौतिक दृष्टि से प्रभु को मार्ग दिखाने के लिए निषादराज तो साथ में हैं ही, और वैसे भी यमुना के बाद तो प्रभु स्वयं ही यात्रा करते हैं । किन्तु भई ! जो प्रश्न सुनने में बड़ा भौतिक सा प्रतीत होता है, उस छोटे प्रश्न में भगवान राम ने समाज के उस शाश्वत प्रश्न को दोहराया है जो जीवन पथ में प्रत्येक व्यक्ति के सामने आता है । यद्यपि छोटी-मोटी शरीरगत यात्राएँ तो हमारे और आपके जीवन में न जाने कितनी होती हैं, पर अगणित जन्मों में जीव की एक यात्रा चल रही है । किन्तु विडम्बना यह है कि जहाँ सांसारिक यात्रा में व्यक्ति क्रमशः लक्ष्य के समीप पहुँच जाता है, वहाँ आन्तरिक जीवन में वह लक्ष्य से दूर होता जा रहा है । आनन्द की जैसी अनुभूति व्यक्ति को जीवन के प्रारम्भिक क्षणों में होती रहती थी, आगे बढ़ता हुआ वह इससे वंचित हो जाता है । इसका क्या कारण है ? यदि यह प्रश्न किसी से किया जाय तो इसका सांकेतिक उत्तर यही है कि यदि समय अधिक लग रहा हो, किन्तु उसके बाद भी अगर हम अपने घर के पास नहीं पहुँच रहे हैं तो इसका सरल सा अर्थ यही है कि सही मार्ग से भटक गये होंगे । क्योंकि सही मार्ग पर चलने का एक स्पष्ट प्रमाण यह है कि समय बीतने के साथ-साथ हम अपने गन्तव्य के निकट तक पहुँचेंगे । किन्तु यात्रा में केवल चलने मात्र से काम नहीं चलेगा अपितु सही मार्ग का निर्धारण भी आवश्यक है । क्योंकि सही मार्ग पर अगर न चला तो स्वाभाविक रूप से व्यक्ति भटककर अपने लक्ष्य से दूर होता जायेगा ।
Monday, 19 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
आप यदि विचार करके देखें तो आपको लगेगा कि महर्षि भरद्वाज से मार्ग के विषय में प्रश्न कर श्री राघवेन्द्र ने वही कृपा की जो प्रार्थना तुलसीदास जी कर रहे थे । जीव भटका हुआ था, ईश्वर के पास पहुँच नहीं रहा था, किन्तु भगवान स्वयं मनुष्य बनकर अवतरित हो गये । तथा वे स्वयं यात्री बन गये । और यात्री बनकर जीवन के जो विविध प्रश्न थे, उन सबका समाधान दिया । तो यह जो भरद्वाज जी से भगवान का वार्तालाप है, वह भी हमारे जीवन का प्रश्न है । और भई ! यह प्रश्न तो बड़ा पुराना है । महाभारत में भी यही प्रश्न आपको मिलेगा, जो भगवान राम का है । यहाँ पर भगवान राम ने महर्षि भरद्वाज से यह नहीं बताया कि कहाँ जाना है । ज्ञान की दृष्टि से इसलिए नहीं बताया कि वे स्वयं ईश्वर हैं । पर अगर साधना की दृष्टि से देखें तो इसका अभिप्राय है कि भगवान श्रीराघवेन्द्र ने कहा - महाराज ! मैं इसलिए नहीं बता रहा हूँ कि मुझे अपने लक्ष्य का ही पता नहीं है कि कहाँ जाना है, क्योंकि मैं तो अल्पज्ञ जीव हूँ । तो आप ही लक्ष्य बताइए और आप ही मार्ग बताइए । इसका अभिप्राय है कि जीवन-पथ में जब कभी यह दुविधा उत्पन्न हो कि सही मार्ग कौन-सा है, जीवन में कैसे चलें कि जिससे अपने लक्ष्य तक पहुँच जायँ ? तो हमें रामचरितमानस एवं महाभारत के इन दृष्टांतों के द्वारा उस दुविधा का निराकरण करना चाहिए ।
Sunday, 18 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
विनय-पत्रिका के इस पद 'राम कहत चलु....' में अंत में गोस्वामीजी प्रभु से कहते हैं - महाराज ! यात्री भटक रहा हो और उसे याद न हो कि कहाँ जाना है, लेकिन जिसके यहाँ जाना हो कहीं वही आ जाय और आकर कहे कि अच्छा अब मेरे साथ चले चलो, इससे बढ़कर यात्री के लिए सुख कुछ नहीं होगा । प्रभु ! इसी प्रकार जीव भटका हुआ है, यद्यपि लक्ष्य तो आप ही हैं, पर वह आपको भूल गया है । अब तो कृपा करके आप ही आकर उसको ले चलिए, और ले जाकर उसको उसके गाँव तक पहुँचा दीजिए । आप ही मार्गदर्शक बनिए और आप ही मार्ग बनिए तथा आप ही लेकर उसको लक्ष्य तक पहुँचा दीजिए ।
Saturday, 17 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
.....कल से आगे.....
गोस्वामीजी ने कहा कि एक तो ऐसी डोली मिल गयी, और ऊपर से कहार विषम संख्या में मिल गये, और फिर जब वे अपनी-अपनी ओर खींचते हैं तो क्या होता है ? बोले - यात्री को चारों ओर से हिलाया जा रहा है और बेचारा यात्री उसमें परेशान हो रहा है । किसी ने गोस्वामीजी से कहा - कहार जब आपके हैं तो उन्हें डाँटना चाहिए, सेवक को वश में रहना चाहिए । उन्होंने कहा - बस ! कठिनाई तो यही है, क्योंकि जितना वेतन वे कहार चाहते हैं उतना वेतन यदि उन्हें दिया जायेगा तब तो वे वश में रहेंगे, अन्यथा वे उच्छृंखल हो सकते हैं । किन्तु जितना वेतन वे चाहते हैं, उतना तो हम दे नहीं पाते । इन्द्रियाँ जितना भोग चाहती हैं, उतना हम नहीं दे पाते । इसलिए ये हमारी बात नहीं मानती । तो किसी ने गोस्वामीजी से कहा कि महाराज ! आप इनसे वायदा कर दीजिए कि अभी तो हम पूरा वेतन नहीं दे पा रहे हैं, परन्तु जब हमारे गाँव पहुँचा दोगे तो तुम्हारा पूरा वेतन चुका देंगे । जो तुम्हारी इच्छा है वह पूरी कर देंगे । और तब तुलसीदास जी ने जो अन्तिम वाक्य कहा वह सबसे बड़ा व्यंग्य था । गोस्वामीजी ने कहा - भैया ! यही तो सबसे बड़ी समस्या है । क्योंकि एक डोली सड़ी हुई, कहार जो हैं वे विषम हैं । और चारों ओर खींच रहे हैं । मार्ग में मार्ग व्यय चुकाने के लिए द्रव्य नहीं है । पर सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमें यही याद नहीं है कि हमको जाना कहाँ है ? कहार यदि कहीं पूछ ही दें कि आपको कहाँ ले चलना है, यह तो बताइए ? तो उसका हमें पता ही नहीं है । इसका अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति से यदि पूछा जाय कि आपके जीवन का लक्ष्य क्या है तो वह भौंचक्का होकर देखेगा - अरे ! सचमुच जीवन का लक्ष्य क्या है इसका तो पता ही नहीं है । गोस्वामीजी ने कहा कि परिणाम यह होता है कि जब यात्री ऐसी यात्रा करें तो ज्यों-ज्यों वह चलेगा, त्यों-त्यों जन्म व्यतीत होंगे त्यों-त्यों व्यक्ति लक्ष्य से दूर होता जायेगा ।
गोस्वामीजी ने कहा कि एक तो ऐसी डोली मिल गयी, और ऊपर से कहार विषम संख्या में मिल गये, और फिर जब वे अपनी-अपनी ओर खींचते हैं तो क्या होता है ? बोले - यात्री को चारों ओर से हिलाया जा रहा है और बेचारा यात्री उसमें परेशान हो रहा है । किसी ने गोस्वामीजी से कहा - कहार जब आपके हैं तो उन्हें डाँटना चाहिए, सेवक को वश में रहना चाहिए । उन्होंने कहा - बस ! कठिनाई तो यही है, क्योंकि जितना वेतन वे कहार चाहते हैं उतना वेतन यदि उन्हें दिया जायेगा तब तो वे वश में रहेंगे, अन्यथा वे उच्छृंखल हो सकते हैं । किन्तु जितना वेतन वे चाहते हैं, उतना तो हम दे नहीं पाते । इन्द्रियाँ जितना भोग चाहती हैं, उतना हम नहीं दे पाते । इसलिए ये हमारी बात नहीं मानती । तो किसी ने गोस्वामीजी से कहा कि महाराज ! आप इनसे वायदा कर दीजिए कि अभी तो हम पूरा वेतन नहीं दे पा रहे हैं, परन्तु जब हमारे गाँव पहुँचा दोगे तो तुम्हारा पूरा वेतन चुका देंगे । जो तुम्हारी इच्छा है वह पूरी कर देंगे । और तब तुलसीदास जी ने जो अन्तिम वाक्य कहा वह सबसे बड़ा व्यंग्य था । गोस्वामीजी ने कहा - भैया ! यही तो सबसे बड़ी समस्या है । क्योंकि एक डोली सड़ी हुई, कहार जो हैं वे विषम हैं । और चारों ओर खींच रहे हैं । मार्ग में मार्ग व्यय चुकाने के लिए द्रव्य नहीं है । पर सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमें यही याद नहीं है कि हमको जाना कहाँ है ? कहार यदि कहीं पूछ ही दें कि आपको कहाँ ले चलना है, यह तो बताइए ? तो उसका हमें पता ही नहीं है । इसका अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति से यदि पूछा जाय कि आपके जीवन का लक्ष्य क्या है तो वह भौंचक्का होकर देखेगा - अरे ! सचमुच जीवन का लक्ष्य क्या है इसका तो पता ही नहीं है । गोस्वामीजी ने कहा कि परिणाम यह होता है कि जब यात्री ऐसी यात्रा करें तो ज्यों-ज्यों वह चलेगा, त्यों-त्यों जन्म व्यतीत होंगे त्यों-त्यों व्यक्ति लक्ष्य से दूर होता जायेगा ।
Friday, 16 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
विनय-पत्रिका के इस पद - राम कहत चलु ....- में गोस्वामीजी ने आगे कहा कि कुटिल करमचंद जी ने ऐसा दान (शरीर) दे दिया कि न तो इसको बदल सकते हैं, न ही छोड़ सकते हैं । बल्कि जीवन भर उसी की सेवा में लगे रहते हैं । किसी ने कहा कोई बात नहीं, अगर डोली बुरी भी है तो क्या बात है, अभी तो काम चलाइए । गोस्वामीजी ने कहा कि अभी तो इसका पूरा वर्णन और सुन लीजिए । क्योंकि जो डोली होती है उसमें ढोने वाले लगाये जाते हैं दो या चार । एक आगे, एक पीछे या दो आगे और दो पीछे । किन्तु यह जो डोली करमचंद जी ने दी है, इसमें कहार भी लगे हुए हैं, तो ग्यारह । अब किस तरफ किसको लगायें, इसका बँटवारा कैसे करें ? अगर दस भी होते, तो पाँच-पाँच दोंनो ओर लगा देते, पर जहाँ ग्यारह हों उनको कहाँ-कहाँ खड़ा करें ? ग्यारह कहार का अर्थ है पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक मन । इन्हीं ग्यारह कहारों के द्वारा हमारा शरीर चल रहा है । गोस्वामीजी कहते हैं कि इस यात्रा में जीव को महान कष्ट होता है क्योंकि संसार में कहार जब चलेंगे तब एक ही दिशा में यात्री को लेकर चलेंगे । लेकिन यहाँ, जितने भी कहार हैं वे सब अपनी-अपनी ओर खींच रहे हैं । आँख अपनी ओर, कान अपनी ओर, चिह्वा अपनी ओर, नाक अपनी ओर तथा त्वचा अपनी ओर । इस प्रकार सारे कहार अपनी-अपनी ओर खींच रहे हैं । और यह मन वाला कहार तो इतना विकट है कि यह कब किधर उछलकर लग जायेगा इसका कोई पता नहीं । यह सर्वदा स्थान ही बदलता रहता है । कभी आँख के साथ, कभी कान के साथ, कभी जिह्वा के साथ, जब देखिए तब उछल रहा है ।
.......आगे कल .....
.......आगे कल .....
Thursday, 15 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
विनय-पत्रिका में गोस्वामीजी कर्म के साथ बहुधा एक शब्द जोड़ दिया करते हैं और वह शब्द है - कुटिल । जीवन-यात्रा के इस पद में कुटिल के साथ करम में चंद और जोड़कर कुटिल करमचंद नाम बना दिया उन्होंने । यह नहीं कहा कि कर्म से डोली मिली है बल्कि यह कहा कि कुटिल करमचंद ने इसे दिया है । यह दानी का नाम है । तो महाराज ! आप दानी को कुटिल क्यों कह रहे हैं ? उन्होंने कहा - भई ! दानी ऐसी वस्तु दे कि जिसे पाकर पाने वाले को सुख मिले, तब तो वह बड़ा उदार दानी है । पर यदि ऐसी वस्तु दे जिसे पाने वाला जीवन भर उसे ढोते-ढोते मर जाय, दुख ही दुख पाता रहे, तब तो सचमुच वह बड़ा कुटिल दानी है । करमचंदजी ने शरीर तो दे दिया पर शरीर हम लोगों को ढो रहा है, या हम शरीर को ढो रहे हैं । दिन-रात जो चेष्टा चल रही है, वह शरीर की सेवा है, या शरीर द्वारा आत्मा की सेवा हो रही है, तो भई ! शरीर की सेवा पाकर जीव को यदि सुख मिले तब तो इसे पाने का आनन्द है, पर हमें दिखायी यह देता है कि जीव शरीर की सेवा में लगा हुआ है ।
Wednesday, 14 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
गोस्वामीजी ने कल्पना की कि यात्री को यह चिंता रहती है कि अगर हम पैदल चलेंगे तो कष्ट होगा । अतः व्यक्ति यह चाहता है कि ढोने वाला यदि कोई दूसरा मिल जाय और दूसरे के कन्धे पर बैठकर अगर हम चल सकें तो इससे बढ़िया बात क्या होगी ? प्राचीन काल में जब अन्य सवारियाँ नहीं थीं तब गाँव में एक छोटी सी खाट को बाँस के आधार पर लटकाकर उसमें आदमी को बैठाकर ढोया जाता था । गोस्वामीजी ने बताया कि जीव तो यात्री है, और उसका शरीर डोली है । यह जीव (आत्मतत्व) शरीर की डोली में बैठकर यात्रा कर रहा है । किसी ने कहा, यह तो बड़े आनन्द की बात हो गयी कि जीव को डोली में बैठकर यात्रा करनी है । तो गोस्वामीजी ने कहा - यह डोली कैसी है, उठाने वाले कहार कैसे हैं, पहले इसका पूरा परिचय तो आप पढ़ लीजिए । डोली कैसी है ? तो आपने देखा होगा कि जो डोली बनायी जाती है, उसमें बाँस ऐसा लगाया जाता है कि जो सड़ा हुआ न हो, अन्यथा बेचारा यात्री बाँस के टूट जाने से गिर जायेगा । पर यहाँ पर जीव ने जो डोली बनायी है उसका बाँस कैसा है ? गोस्वामीजी ने कहा - बाँस पुराना और सड़ा हुआ है और खटोला जो है वह तिकोना है । चौकोर हो तो आराम मिले, पर जब तिकोना होगा तो व्यक्ति पैर भी ठीक से फैला नहीं सकेगा । इसका अभिप्राय है कि सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण का यह तिकोना खटोला है । और शरीर ऐसा मिला हुआ है, जैसे सड़ा हुआ बाँस, कब कहाँ से टूट जाय, इसका कोई ठिकाना नहीं; इसी प्रकार से शरीर का कौन-सा अंग कब रोगी हो जाये इसे कौन कह सकता है ? किसी ने गोस्वामीजी से कहा - महाराज ! अगर डोली पर ही चलना है तो बढ़िया डोली पर क्यों नहीं चल रहे हैं ? तुलसीदासजी ने कहा भई ! डोली अगर अपने द्वारा बनवायी गयी हो तब तो हम अपने मन की बनवायेंगे, पर किसी ने दान में दी हो तो फिर अपने मन के अनुरुप बनवाने का प्रश्न ही नहीं है । तो जीव को यह जो डोली मिली हुई है, वह बेचारे की स्वयं की इच्छा से नहीं बनी है बल्कि यह तो दान की है । तो किसने दिया है दान ? बोले - करमचंद ने यह डोली दान में दी है । इसका अभिप्राय है कि व्यक्ति ने जैसे कर्म किये वैसा ही शरीर मिल गया, अब शरीर का परिवर्तन तो हो ही नहीं सकता ।
Tuesday, 13 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
विनय-पत्रिका के एक पद में गोस्वामीजी जीवन यात्रा पर एक व्यंग्यात्मक चित्र प्रस्तुत करते हुए यात्रियों को सावधान कर रहे हैं - राम कहत चलु, राम कहत चलु, राम कहत चलु भाई रे । नाहीं तौ भव-बेगारि महँ परिहै ।। उन्होंने कहा - राम कहते चलो, राम कहते चलो । क्यों ? यदि न कहें तो क्या हानि होगी ? बोले - भई ! नहीं तो बेगार में पकड़ लिये जाओगे । बेगार की परम्परा अब तो देश में रही नहीं, लेकिन पहले थी । राजा-महाराजा या जमींदार होते थे । वे गाँव के लोगों को काम पर बुलाते थे । पर उस काम के बदले में मजदूरी नहीं दी जाती थी । कहा जाता था कि प्रजा होने के नाते यह तुम्हारा कर्तव्य था, तो तुमसे कर्तव्य का पालन कराया गया है, इसकी मजदूरी नहीं दी जायेगी । बेगार शब्द का अर्थ होता है कि जहाँ काम तो करना पड़ता है परन्तु मजदूरी प्राप्त नहीं होती । इसलिए गोस्वामीजी ने व्यंग्य किया कि अगर राम का नाम नहीं लोगे तो संसार वाले अपने-अपने बेगार में पकड़े बिना छोडेंगे नहीं । संसार वाले अपना काम तो ले लेंगे पर बदले में मजदूरी कुछ भी नहीं देंगे । इसलिए राम कहत चलु माने ? अगर कोई पकड़ने की चेष्टा करे और वह व्यक्ति बता दे कि हम आपके राज्य की प्रजा नहीं हैं, हम तो दूसरे राज्य की प्रजा हैं, तो दूसरा व्यक्ति छोड़ देगा कि भाई ! वह तो हमसे बड़ा राजा है, उसकी प्रजा हो तो बेगार लेने का अधिकार हमें नहीं है । गोस्वामीजी ने कहा - जब राम-राम कहते चलोगे, तो बेगार में पकड़ने वाले को याद दिला देना कि हम रामराज्य के नागरिक हैं, तुम्हारे राज्य के नागरिक नहीं हैं, तो बेगार से बच जाओगे । तो भई पहली सावधानी तो यह बरतो कि जब जीवन-यात्रा में चलो तो राम का नाम लेना मत भूलो ।
Monday, 12 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
वस्तुतः संसार में जितने जीव हैं वे सब तो यात्री हैं । और यह यात्रा इतनी लम्बी है कि न जाने कितने जन्मों से चल रही है । और न जाने कितने जन्मों तक चलती जायेगी । लेकिन कुछ विडम्बना इस यात्रा के साथ यह जुड़ी हुई है, जिसका अनुभव शायद प्रत्येक व्यक्ति को होता होगा कि हम और आप जब भौतिक यात्रा करते हैं, उसमें ज्यों-ज्यों समय व्यतीत होता जाता है आप यह सोचकर प्रसन्न होते हैं कि हम गंतव्य के निकट पहुँचते जा रहे हैं, और अन्त में यह संतोष होता है कि हम जहाँ पहुँचना चाहते थे, पहुँच गये । पर अगर हम और आप आंतरिक दृष्टि से विचार करके देखें कि जीवन यात्रा के संदर्भ में भी क्या यही अनुभव हमें और आपको हो रहा है ? इसका अभिप्राय है कि बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था तक ज्यों-ज्यों हम बढ़ते जाते हैं, तो क्या सचमुच हमें यह लगने लगता है कि जीवन के लक्ष्य के पास हम पहुँच गये ? गोस्वामीजी ने विनय-पत्रिका में कहा है कि सांसारिक यात्रा और जीवन यात्रा में अन्तर यह है कि सांसारिक यात्रा में समय बीतने के साथ हम अपने लक्ष्य के पास पहुँचते हैं, परन्तु हमारी जीवन यात्रा में ठीक उल्टी बात यह हो गयी कि ज्यों-ज्यों हम चल रहे हैं त्यों-त्यों हमारा लक्ष्य हमसे दूर हो रहा है । इसका अभिप्राय है कि लड़कपन में जो आनन्द था, बूढ़े होते-होते वह आनंद बढ़ गया है या खो गया है ? इसका उत्तर यही है कि वह आनन्द खो गया है । और अगर आनन्द खो गया है, चिन्ताएं बढ़ गयी हैं तो इससे सिद्ध हो रहा है कि हम लक्ष्य के पास नहीं पहुँचे बल्कि दूर होते गये । हम सबकी जीवन-यात्रा में यह जो विचित्रता है गोस्वामीजी ने इसका रामायण और विनय-पत्रिका के अनेकों प्रसंगों में बड़ा सुन्दर वर्णन किया है ।
Sunday, 11 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
जब भगवान राम महर्षि भरद्वाज से पूछ रहे थे - कहहू नाथ हम केहि मग जाहीं - आप बताइए मैं किस मार्ग से जाऊँ, तो इस समय भगवान राम के प्रिय सखा निषाद भी साथ में थे, और प्रभु का यह वाक्य सुनकर निषादराज तो आश्चर्य से प्रभु का मुँह ताकने लगे । क्योंकि गंगा पार उतारने के बाद निषादराज ने प्रभु से कहा कि आप मुझे साथ में ले लीजिए । प्रभु ने कहा, आप क्यों कष्ट करना चाहते हैं ? तो उन्होंने कहा, महाराज ! मैं आपके साथ रहकर आपको मार्ग दिखाऊँगा । अब आप जरा सोचिए कि जो व्यक्ति आपके साथ यह कहकर चला हो कि मैं आपको मार्ग दिखाऊँगा और उसी के सामने आप किसी दूसरे से पूछने लगें कि भाई ! सही-सही मार्ग बताओ तो इसका सीधा अर्थ यही हुआ कि मार्ग दिखाने वाले उस व्यक्ति पर आपको विश्वास नहीं है । और जब वे कह चुके हैं तो भी भगवान श्रीराघवेन्द्र पूछते क्यों हैं ? गोस्वामीजी का तात्पर्य है कि भगवान राम की यह यात्रा वस्तुतः हमारी और आपकी जीवन यात्रा है । जो समस्याएँ भगवान राम के जीवन में आयीं, हमारे और आपके जीवन की यात्रा में ऐसी समस्याएँ आती हैं । इसलिए अयोध्याकाण्ड में जब गोस्वामीजी तीनों यात्रियों के चलने की पद्धति, उनके प्रश्न, उनकी जिज्ञासा, उनका विश्राम तथा उनका दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं तब इसका फल क्या होना चाहिए ? गोस्वामीजी संकेत करते हुए कहते हैं कि इन तीनों पथिकों की यात्रा को जिन्होंने पूरा समझ लिया है उसके जीवन में उसका प्रभाव यह होता है कि वे संसार-पथ को अत्यंत सरलता से पूरा कर लेते हैं ।
Saturday, 10 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
भगवान श्रीराम ने मानवीय समस्याओं को जिस प्रकार स्वीकार किया उसे गोस्वामीजी ने सूत्र के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा कि अयोध्या से लेकर भगवान श्रीराम की चित्रकूट तक की यात्रा, या चित्रकूट से दण्डकारण्य तक की, अथवा दण्डकारण्य से लंका की यह जो यात्रा है, इस यात्रा की आवश्यकता है क्या ? इस यात्रा के बिना रामराज्य बन सकता था कि नहीं ? और रामराज्य बनाने के लिए तो महाराज श्री दशरथ ने गुरु वसिष्ठ को संदेश भेज ही दिया था कि कल अयोध्या के राजसिंहासन पर मैं श्रीराघवेन्द्र को अभिषिक्त करूँगा । तो फिर श्रीराम सिंहासन पर बैठ जाते और रामराज्य बन जाता । पर भगवान श्रीराम उस मार्ग को स्वीकार नहीं करते, बल्कि रामराज्य में विघ्न आ जाता है । तो, यह विध्न जो है वह ईश्वरत्व का लक्षण है या मनुष्यत्व का ? भला ईश्वर के जीवन में विध्न कैसा ? पर श्रीराम अपने जीवन में विध्न स्वीकार करते हैं । इसका अभिप्राय है कि उन्होंने अपने आपको मनुष्य के रूप में प्रस्तुत किया । गोस्वामीजी कहते हैं कि यह जो भगवान श्रीराम की यात्रा है, उस यात्रा का एक विशेष उद्देश्य है । और वह उद्देश्य क्या है ? यह हमें आगे चलकर दिखायी देता है ।
Friday, 9 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
शबरी जी से जब भगवान राम का संवाद होता है, तब भगवान पूछते हैं - शबरीजी ! क्या आप जनकनन्दिनी सीता जी की सूधि जानती हैं, आप बताइए कि जनकनन्दिनी सीता कहाँ हैं, कैसे मिलेंगी ? अब इसका सही उत्तर क्या है ? अगर इसका तात्विक उत्तर दिया जाय तो क्या शबरी जी इस तत्व को नहीं जानती हैं कि छाया सीता जी का अपहरण हुआ है ? वे भी कह सकती थीं कि न तो हरण हुआ है और न ही खोजने की आवश्यकता है । पर उन्होंने यह नहीं कहा और उसे यदि जाने भी दें तो इतना तो कह ही सकती हैं कि सर्वज्ञ ईश्वर मुझसे पूछ रहा है कि सीता जी कहाँ हैं ? यद्यपि भगवान श्रीराम के प्रश्न को सुनकर वे संकोच में गड़ गयी, परन्तु विनम्रतापूर्वक उन्हें यही कहना पड़ा - प्रभु ! आप पंपासर की यात्रा कीजिए, वहाँ आपकी सुग्रीव से मित्रता होगी । भरद्वाज जी कहते हैं - अच्छा ! आप इन विद्यार्थियों के पीछे जाइये । बाल्मीकि जी भी कहते हैं - अच्छा ! आप चित्रकूट में निवास कीजिए और शबरी जी कहती हैं कि आप सुग्रीव से मित्रता कीजिए । मानो ये जो मार्ग में मिलने वाले महापुरुष हैं, वे भगवान श्रीराघवेन्द्र के मनुष्यत्व का उद्देश्य समझते हैं कि श्रीराम वस्तुतः संसार के प्राणियों को, संसार के जीवों को, साधना का तत्व बताना चाहते हैं और साधना का सत्य बताने के लिए मानवीय जीवन में जो समस्याएँ आती हैं उन समस्याओं को भगवान श्रीराम ने अपने जीवन में स्वीकार किया तथा उनका मानवीय पद्धति से उन्होंने ऐसा समाधान बताया कि जिससे हमें और आपको साधना का सत्य मिले, तथा जीवन में सही-सही चलने की शिक्षा प्राप्त हो ।
Thursday, 8 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ............
सारा संसार ब्रह्म है, यह तत्वज्ञान है । लेकिन क्या इसके आधार पर सारे संसार का व्यवहार चलेगा ? जब आप एक-दूसरे से व्यवहार करेंगे तो व्यक्तियों को अलग-अलग मानकर उसकी अलग-अलग योग्यता के अनुसार ही व्यवहार करेंगे और यह जो भेद आप स्वीकार करते हैं, वह जीवन का व्यवहारिक सत्य है, इसकी अपेक्षा है । लेकिन इसके साथ-साथ तत्वज्ञान की भी आवश्यकता है । अर्जुन से भगवान ने कहा - अर्जुन ! विराट रूप देखे बिना यदि तुम लड़कर इन्हें मारते तो तुम्हें अभिमान हुए बिना न रहता कि मैंने इतने बड़े-बड़े योद्धाओं को मार डाला । लेकिन अब अन्तर यह पड़ गया कि यद्यपि तुम लड़ोगे और लोगों की दृष्टि में तुम्हारे द्वारा ही ये मारे भी जायेंगे, लेकिन तुम जिस सत्य का साक्षात्कार कर चुके हो उससे तुम्हें निरन्तर यह बोध बना रहेगा कि नहीं-नहीं, मारने वाले तो प्रभु हैं, मैं तो केवल इस मंच पर मारता हुआ दिखायी दे रहा हूँ । इसलिए दोनों की आवश्यकता है । व्यवहार में तुम लड़ो और आतंरिक रूप से, मैंने जो दृष्टि दी है, उसके द्वारा तुम्हारे कर्तृत्व का अभिमान मिटे, यही साधना और साध्य तत्व का सामंजस्य हैं ।
Wednesday, 7 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
भगवान कृष्ण ने ज्ञानमयी दृष्टि अर्जुन को दी तथा अर्जुन ने उस ज्ञानमयी दृष्टि से जब भगवान का विराट रूप देखा तो उसे दिखायी पड़ा कि भीष्म, कर्ण, द्रोण आदि जितने भी योद्धा हैं वे सब के सब भगवान के विराट के मुख में मरे हुए पड़े हैं । अर्जुन से भगवान पूछते हैं कि अर्जुन ! ये जो तुम्हें मरे हुए दिखाई दे रहे हैं वे तुम्हें अपनी आँखों से दिखाई दे रहे हैं या मैंने जो आँखें दी हैं उनसे दिखाई दे रहे हैं ? अर्जुन ने कहा - महाराज ! आपने जो आँखें दी हैं, उनसे ऐसा लग रहा है । भगवान ने कहा - अर्जुन ! मेरी दी हुई आँखों से जो दिखाई दे रहा है वही जब तुम्हारी आँखों से दिखाई देने लगे, तब तो बात पूरी होगी नहीं तो बात अधूरी रहेगी । जब मुझे दिखाई दे और तुम्हें न दिखाई दे तब तक पूर्णता नहीं है । फिर यदि चाहते तो अर्जुन भी यही बात कह सकते थे कि आपने विराट रूप दिखाया ही क्यों ? तो भगवान ने एक महत्वपूर्ण सूत्र देते हुए कहा - अर्जुन ! विराट रूप मैंने दिखाया केवल कर्तव्य का अभिमान मिटाने के लिए, साधन मिटाने के लिए नहीं दिखाया है । सचमुच यह बहुत ही गंभीर सूत्र है । इसका अभिप्राय है कि कर्तव्य के अभिमान का मिटना तो जीवन में परमावश्यक है, पर कर्तृत्व के अभिमान के मिटने का परिणाम कहीं यह न हो जाय कि व्यक्ति साधन ही करना बन्द कर दे, पुण्य और सत्कर्म करना भी बन्द कर दें । इसलिए जब भी साध्य तत्व से उतरकर साधना में आवें तब हमें जीवन में असीम दृष्टि के स्थान पर ससीम दृष्टि बनानी पड़ेगी, तभी हम व्यवहार चला पायेंगे ।
Tuesday, 6 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को विराट रूप दिखाते हैं और विराट रूप देखने के लिए भगवान अर्जुन को दिव्य दृष्टि भी देते हैं । तो भई ! जब भगवान ने अर्जुन को विराट रूप दिखा दिया और दिव्य दृष्टि दे ही दी तो फिर अर्जुन की वह दिव्य दृष्टि यदि जीवन भर बनी रहती, तो क्या बुराई थी ? उसे एक बार देकर पुनः वापस लौटा लेने की क्या आवश्यकता थी ? इसका क्या अभिप्राय है ? उसका भी मूल तत्व यही है कि विराट रूप का दर्शन कराकर भगवान ने अर्जुन को सत्य का साक्षात्कार कराया, साध्य का ज्ञान कराया । इसका अभिप्राय है कि जब हम ईश्वर के तत्व को जान लेते हैं, तो हमारे जीवन का जो साध्य तत्व है, जिसे हमें पाना है, उसका हमें बोध हो जाता है और साध्य तत्व का यह ज्ञान जीवन का महान फल है, तथा उस साध्य तत्व के ज्ञान के लिए ही भगवान ने अर्जुन को ज्ञानमयी दृष्टि दी । लेकिन भगवान ने तुरन्त वह दृष्टि वापस लौटा दी । परन्तु क्यों लौटा ली बस यही सबसे महत्वपूर्ण बात है । विराट रूप दिखाने के पश्चात भगवान ने अर्जुन की ओर देखा और बोले - अर्जुन ! कैसा लगा तुम्हें ? अर्जुन बोले - महाराज ! समस्या का समाधान हो गया । क्योंकि मैं लड़ने से ही डर रहा था, पर जब देख लिया कि ये सब मरे हुए हैं तब अब तो लड़ने की आवश्यकता नहीं है । बस भई ! यही सबसे बड़ी कठिनाई है । जिस आँख से साध्य का बोध हुआ, अर्जुन अगर उसी आँख से देखता रहे तब न तो वह धनुष उठायेगा, और न ही लड़ेगा । क्योंकि उसको तो दिखायी दे रहा है कि ये सब के सब मरे हुए हैं । याद रखियेगा, सर्वत्र यही समस्या है । रामायण में भी यदि सर्वत्र श्रीराम के केवल ईश्वरत्व का ही प्रतिपादन कर दिया जाए तो साधना का जो तत्व मनुष्य के जीवन में प्रकट करना चाहते हैं, वह संभव नहीं होगा । क्योंकि विराट की अनुभूति तथा विराट की दृष्टि के द्वारा तत्वज्ञान तो होता है पर व्यवहार नहीं चलता । व्यवहार जब चलेगा तो ससीम दृष्टि से ही चलेगा, असीम दृष्टि से नहीं चलेगा ।
Monday, 5 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
....कल से आगे.....
महर्षि भरद्वाज पहले भगवान राम से सांकेतिक भाषा में यह कहते हैं कि आप तो साक्षात ईश्वर हैं । इसलिए मार्ग का प्रश्न ही कहाँ है ? जो साध्य तत्व है उसके लिए भला मार्ग की क्या आवश्यकता है ? और आगे चलकर भगवान राम जब महर्षि बाल्मीकि से पूछते हैं कि मैं कहाँ रहूँ तो प्रारंभिक उत्तर में वहाँ भी आप वे ही दोनों बातें पायेंगे, जो परस्पर विरोधी हैं । भरद्वाज की बात भी परस्पर विरोधी है, क्योंकि भगवान को पहले मार्ग न बताना और बाद में मार्गदर्शन देना । भगवान राम ने बाल्मीकि जी से कहा - मैं कहाँ रहूँ आप बताइए, तब पहले तो महर्षि मुस्कराने लगे और कुछ देर उत्तर देने से रुक गये । परन्तु प्रभु ने आश्चर्य से मुनि की ओर देखा - महाराज ! इस नन्हे से प्रश्न का उत्तर देने में इतना विलम्ब क्यों लग रहा है । तो महर्षि ने तुरन्त कहा - पहले आप यह बता दीजिए कि आप कहाँ नहीं हैं ? जब आप बता देंगे कि यहाँ नहीं है, तो हम कह देंगे कि अमुक स्थान पर रहिए । बाल्मीकि जी के ऐसा कहने के बाद भगवान राम ने उनके प्रश्न का उत्तर नहीं दिया । भगवान श्रीराघवेन्द्र ने नहीं बताया कि मैं कहाँ हूँ, किन्तु भगवान राम का उत्तर बिना सुने ही महर्षि बाल्मीकि ने कहना प्रारंभ कर दिया - राम ! अब मैं आपको वे स्थान बता रहा हूँ जहाँ आप श्री सीताजी तथा लक्ष्मण जी के साथ निवास कीजिए । तो क्या ये परस्पर विरोधी बातें नहीं लगती ? महर्षि भरद्वाज और महर्षि बाल्मीकि के कथन का सामंजस्य यह है कि साध्य तत्व के ज्ञान के बिना तो ये विराट दृष्टि तत्वज्ञान के लिए उपयोगी है, पर अगर विराट दृष्टि सर्वदा बनी रहे तो साधना होना समाप्त हो जायेगा । विराट तत्व का जो बोध है, ईश्वरत्व का बोध है, उसके द्वारा मनुष्य के जीवन में ज्ञान की उपलब्धि तो हो जायेगी, साध्य पक्ष की अनुभूति तो हो जायेगी पर साधन की स्थिति नहीं बन पायेगी । गीता और रामचरितमानस दोनों ही ग्रन्थों से हम इसके दृष्टांत ले सकते हैं ।
महर्षि भरद्वाज पहले भगवान राम से सांकेतिक भाषा में यह कहते हैं कि आप तो साक्षात ईश्वर हैं । इसलिए मार्ग का प्रश्न ही कहाँ है ? जो साध्य तत्व है उसके लिए भला मार्ग की क्या आवश्यकता है ? और आगे चलकर भगवान राम जब महर्षि बाल्मीकि से पूछते हैं कि मैं कहाँ रहूँ तो प्रारंभिक उत्तर में वहाँ भी आप वे ही दोनों बातें पायेंगे, जो परस्पर विरोधी हैं । भरद्वाज की बात भी परस्पर विरोधी है, क्योंकि भगवान को पहले मार्ग न बताना और बाद में मार्गदर्शन देना । भगवान राम ने बाल्मीकि जी से कहा - मैं कहाँ रहूँ आप बताइए, तब पहले तो महर्षि मुस्कराने लगे और कुछ देर उत्तर देने से रुक गये । परन्तु प्रभु ने आश्चर्य से मुनि की ओर देखा - महाराज ! इस नन्हे से प्रश्न का उत्तर देने में इतना विलम्ब क्यों लग रहा है । तो महर्षि ने तुरन्त कहा - पहले आप यह बता दीजिए कि आप कहाँ नहीं हैं ? जब आप बता देंगे कि यहाँ नहीं है, तो हम कह देंगे कि अमुक स्थान पर रहिए । बाल्मीकि जी के ऐसा कहने के बाद भगवान राम ने उनके प्रश्न का उत्तर नहीं दिया । भगवान श्रीराघवेन्द्र ने नहीं बताया कि मैं कहाँ हूँ, किन्तु भगवान राम का उत्तर बिना सुने ही महर्षि बाल्मीकि ने कहना प्रारंभ कर दिया - राम ! अब मैं आपको वे स्थान बता रहा हूँ जहाँ आप श्री सीताजी तथा लक्ष्मण जी के साथ निवास कीजिए । तो क्या ये परस्पर विरोधी बातें नहीं लगती ? महर्षि भरद्वाज और महर्षि बाल्मीकि के कथन का सामंजस्य यह है कि साध्य तत्व के ज्ञान के बिना तो ये विराट दृष्टि तत्वज्ञान के लिए उपयोगी है, पर अगर विराट दृष्टि सर्वदा बनी रहे तो साधना होना समाप्त हो जायेगा । विराट तत्व का जो बोध है, ईश्वरत्व का बोध है, उसके द्वारा मनुष्य के जीवन में ज्ञान की उपलब्धि तो हो जायेगी, साध्य पक्ष की अनुभूति तो हो जायेगी पर साधन की स्थिति नहीं बन पायेगी । गीता और रामचरितमानस दोनों ही ग्रन्थों से हम इसके दृष्टांत ले सकते हैं ।
Sunday, 4 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
गत 2 दिसम्बर के प्रसंग से आगे.....
श्री राघवेन्द्र और महर्षि भरद्वाज में जो अनोखा वार्तालाप हुआ, वस्तुतः उसमें ईश्वरत्व और मनुष्यत्व दोनों तत्वों का अनोखा समन्वय विद्यमान है । भगवान श्रीराम का जो प्रश्न है उस प्रश्न को पढ़कर ऐसा नहीं लगता है कि यह प्रश्न ईश्वर के द्वारा किया गया है । यह प्रश्न तो एक मनुष्य का, एक जिज्ञासु का प्रश्न प्रतीत हो रहा है । और महर्षि ने प्रारंभ में तो - सुगम सकल मग तुम्ह कहँ अहहीं । - वाक्य के द्वारा सांकेतिक भाषा में श्रीराम के ईश्वरत्व की ओर संकेत कर दिया, लेकिन ईश्वरत्व की ओर संकेत करने के बाद यदि वे कहीं रुक जाते कि तुम्हें मार्ग बताने की आवश्यकता नहीं है, या यह कह देते कि तुम तो साक्षात ब्रह्म हो, तुम्हें मार्ग कौन दिखा सकता है तो लगता कि प्रारंभ में जो उन्होंने कहा था उसी का अन्त तक निर्वाह किया । लेकिन प्रारंभ में श्रीराम की ईश्वरता की ओर संकेत करने के बाद भगवान श्रीराघवेन्द्र के मार्गदर्शन के लिए उन्होंने विद्यार्थियों को बुलाया और वे विद्यार्थीगण मार्ग दिखाते हुए भगवान को लेकर गये ।
......आगे कल ....
श्री राघवेन्द्र और महर्षि भरद्वाज में जो अनोखा वार्तालाप हुआ, वस्तुतः उसमें ईश्वरत्व और मनुष्यत्व दोनों तत्वों का अनोखा समन्वय विद्यमान है । भगवान श्रीराम का जो प्रश्न है उस प्रश्न को पढ़कर ऐसा नहीं लगता है कि यह प्रश्न ईश्वर के द्वारा किया गया है । यह प्रश्न तो एक मनुष्य का, एक जिज्ञासु का प्रश्न प्रतीत हो रहा है । और महर्षि ने प्रारंभ में तो - सुगम सकल मग तुम्ह कहँ अहहीं । - वाक्य के द्वारा सांकेतिक भाषा में श्रीराम के ईश्वरत्व की ओर संकेत कर दिया, लेकिन ईश्वरत्व की ओर संकेत करने के बाद यदि वे कहीं रुक जाते कि तुम्हें मार्ग बताने की आवश्यकता नहीं है, या यह कह देते कि तुम तो साक्षात ब्रह्म हो, तुम्हें मार्ग कौन दिखा सकता है तो लगता कि प्रारंभ में जो उन्होंने कहा था उसी का अन्त तक निर्वाह किया । लेकिन प्रारंभ में श्रीराम की ईश्वरता की ओर संकेत करने के बाद भगवान श्रीराघवेन्द्र के मार्गदर्शन के लिए उन्होंने विद्यार्थियों को बुलाया और वे विद्यार्थीगण मार्ग दिखाते हुए भगवान को लेकर गये ।
......आगे कल ....
Saturday, 3 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
रामचरितमानस में गोस्वामीजी ने भगवान श्री राघवेन्द्र तथा विदेहनन्दिनी श्रीसीताजी के विवाह का बड़ा ही मधुर चित्र प्रस्तुत किया। किन्तु अनोखापन यह है कि उस वर्णन में वे अपनी लेखनी के माध्यम से एक ओर तो दिव्य रस की सृष्टि करते हैं, तथा दूसरी ओर वे उसमें अपनी दार्शनिक शैली को अवश्य जोड़ देते हैं। यह भगवान श्रीराम का विवाह जो त्रेतायुग का सत्य है, उसे हम केवल त्रेतायुग या भूतकाल के सत्य के रूप में ही देखने की चेष्टा न करें, अपितु प्रयत्न तो यह करना चाहिए कि भूतकाल का यह सत्य हमारे वर्तमान जीवन का सत्य बन जाय। त्रेतायुग में महाराज श्री जनक के मण्डप में संपन्न होने वाले उस विवाह की समग्र प्रक्रिया हमारे जीवन में ही संपन्न हो जाय। हम स्वयं जनक बन जायँ, सुनयना बन जायँ, अथवा जनकपुरवासिनी स्त्रियों में से कोई भावमयी स्त्री बनकर भगवान से नाता जोड़ सकें।
गोस्वामीजी कहते हैं कि वस्तुतः श्रीराम को दूल्हा बनाने में लाभ-ही-लाभ है। आपने देखा होगा कि विवाह की एक परम्परा है कि दूल्हा घोड़े पर बैठकर चलता है। जब दूल्हे के रूप में श्रीराम का साक्षात्कार हुआ तो तुलसीदासजी कहते हैं कि अब बहुत अच्छा दुल्हा मिला; बस ! इनको तुरन्त ही घोड़े पर बैठा दो। एक पाठक ने गोस्वामीजी से पूछा कि महाराज ! जरा यह तो बता दीजिए कि यह घोड़ा अयोध्या का है कि जनकपुर का ? तो उन्होंने कहा कि भई! यह घोड़ा न तो जनकपुर का है और न ही अयोध्या का, अपितु यह घोड़ा तो प्रभु को हम लोगों ने ही दिया है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति के पास एक-एक घोड़ा विद्यमान है तथा हम यदि प्रभु का विवाह अपने अन्तःकरण के मण्डप में संपन्न कराना चाहें तो भगवान श्रीराघवेन्द्र को उस अश्व पर विराजमान कर सकते हैं। जब दूल्हा के वेश में श्रीराम ड्योढ़ी पर खड़े थे तो तुलसीदासजी ने ने तुरन्त अपने मन का घोड़ा श्रीराघवेन्द्र के समक्ष खड़ा कर दिया तथा कहा कि महाराज इस अवसर पर आपको चंचल घोड़ा ही तो चाहिए इसलिए इस चंचल मन के घोड़े पर बैठ जाइये न ! इस घोड़े अर्थात मन को हम वश में करने का प्रयास करें इसके स्थान पर यदि आप ही इसे अपने वश में कर लें तो सबसे अच्छा रहेगा।
गोस्वामीजी कहते हैं कि वस्तुतः श्रीराम को दूल्हा बनाने में लाभ-ही-लाभ है। आपने देखा होगा कि विवाह की एक परम्परा है कि दूल्हा घोड़े पर बैठकर चलता है। जब दूल्हे के रूप में श्रीराम का साक्षात्कार हुआ तो तुलसीदासजी कहते हैं कि अब बहुत अच्छा दुल्हा मिला; बस ! इनको तुरन्त ही घोड़े पर बैठा दो। एक पाठक ने गोस्वामीजी से पूछा कि महाराज ! जरा यह तो बता दीजिए कि यह घोड़ा अयोध्या का है कि जनकपुर का ? तो उन्होंने कहा कि भई! यह घोड़ा न तो जनकपुर का है और न ही अयोध्या का, अपितु यह घोड़ा तो प्रभु को हम लोगों ने ही दिया है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति के पास एक-एक घोड़ा विद्यमान है तथा हम यदि प्रभु का विवाह अपने अन्तःकरण के मण्डप में संपन्न कराना चाहें तो भगवान श्रीराघवेन्द्र को उस अश्व पर विराजमान कर सकते हैं। जब दूल्हा के वेश में श्रीराम ड्योढ़ी पर खड़े थे तो तुलसीदासजी ने ने तुरन्त अपने मन का घोड़ा श्रीराघवेन्द्र के समक्ष खड़ा कर दिया तथा कहा कि महाराज इस अवसर पर आपको चंचल घोड़ा ही तो चाहिए इसलिए इस चंचल मन के घोड़े पर बैठ जाइये न ! इस घोड़े अर्थात मन को हम वश में करने का प्रयास करें इसके स्थान पर यदि आप ही इसे अपने वश में कर लें तो सबसे अच्छा रहेगा।
Friday, 2 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
आज अगहन मास शुक्ल पक्ष चतुर्थी है, कल पंचमी भगवान श्री सीताराम का विवाह है, इसलिए विषयांतर होते हुए आइये परम पूज्य गुरुदेव भगवान की दृष्टि से विवाह प्रसंग में प्रवेश करें -
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.......
विवाह का तात्पर्य है संबंध की स्थापना। जिस समय जनकपुरवासिनी स्त्रियों की दृष्टि भगवान श्रीराम के सौन्दर्य पर जाती है उस समय उन सबके अन्तःकरण में एक बड़ी विचित्र आकांक्षा उत्पन्न होती है। यद्यपि किसी आकर्षक वस्तु को देखकर उसे प्राप्त करने की अभिलाषा अस्वाभाविक नहीं कही जा सकती, और यदि गोस्वामीजी ऐसा लिखते कि भगवान श्री राघवेन्द्र के सौन्दर्य को देखकर जनकपुरवासिनी स्त्रियाँ सम्मोहित हो गयीं तथा उनके अन्तर्मन में श्रीराम के प्रति आकर्षण उत्पन्न हुआ, तो स्वाभाविक ही होता। लेकिन तुलसीदासजी उसे एक भिन्न रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि श्रीराम का सौन्दर्य देखकर जनकपुरवासिनी स्त्रियों को विदेहनन्दिनी के सौन्दर्य की स्मृति हो जाती है, तथा प्रत्येक स्त्री के अन्तःकरण में यही संकल्प स्फुरित होता है कि यदि श्रीराम का विवाह सीता से हो जाय तो कितना अच्छा हो। जब उनसे पूछा गया कि यदि सीता का श्रीराम से विवाह हो जायेगा तो इससे आप लोगों को क्या लाभ होगा ? तब उन सखियों ने यही कहा कि इसमें लाभ-हानि का प्रश्न ही नहीं है, क्योंकि हमारे अन्तःकरण में तो केवल इनसे संबंध जोड़ने की आकांक्षा है। किसी रसिक भक्त ने प्रश्न कर दिया कि यदि सीताजी से विवाह होगा तब तो विदेहनन्दिनी से श्रीराम का नाता जुड़ेगा, तुम्हारा संबंध तो जुड़ेगा नहीं; और आप लोगों को तो स्वयं का नाता जोड़ना चाहिए, न कि जनकनन्दिनी का ? तो सखियाँ कहती हैं कि ना-ना ! इन्हें देखकर तो हमारे अन्तःकरण में यह निश्चय हो गया कि इनसे सीधे नाता नहीं जोड़ना चाहिए, अपितु श्रीराम से संबंध तो विदेहनन्दिनी के माध्यम से ही जोड़ना उचित रहेगा। जनकपुरवासिनी स्त्रियों को यह भलीभाँति ज्ञात है कि ईश्वर से यदि संबंध जुड़ेगा तो श्रीसीताजी के नाते से ही जुड़ेगा, सीधे हमारे नाते से नहीं। अगर भक्ति-स्वरूपा श्रीजानकीजी से हमारा नाता नहीं होगा तो समस्त विशेषताओं के होते हुए भी हम लोग प्रभु को आकृष्ट करने में समर्थ नहीं होंगे। इस विवाह का मुख्य तात्पर्य है जीव और ईश्वर में संबंध स्थापित करना, और संबंध स्थापित करने के लिए जिस मूल केन्द्र की अपेक्षा है वही जनकनन्दिनी श्रीसीता हैं।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.......
विवाह का तात्पर्य है संबंध की स्थापना। जिस समय जनकपुरवासिनी स्त्रियों की दृष्टि भगवान श्रीराम के सौन्दर्य पर जाती है उस समय उन सबके अन्तःकरण में एक बड़ी विचित्र आकांक्षा उत्पन्न होती है। यद्यपि किसी आकर्षक वस्तु को देखकर उसे प्राप्त करने की अभिलाषा अस्वाभाविक नहीं कही जा सकती, और यदि गोस्वामीजी ऐसा लिखते कि भगवान श्री राघवेन्द्र के सौन्दर्य को देखकर जनकपुरवासिनी स्त्रियाँ सम्मोहित हो गयीं तथा उनके अन्तर्मन में श्रीराम के प्रति आकर्षण उत्पन्न हुआ, तो स्वाभाविक ही होता। लेकिन तुलसीदासजी उसे एक भिन्न रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि श्रीराम का सौन्दर्य देखकर जनकपुरवासिनी स्त्रियों को विदेहनन्दिनी के सौन्दर्य की स्मृति हो जाती है, तथा प्रत्येक स्त्री के अन्तःकरण में यही संकल्प स्फुरित होता है कि यदि श्रीराम का विवाह सीता से हो जाय तो कितना अच्छा हो। जब उनसे पूछा गया कि यदि सीता का श्रीराम से विवाह हो जायेगा तो इससे आप लोगों को क्या लाभ होगा ? तब उन सखियों ने यही कहा कि इसमें लाभ-हानि का प्रश्न ही नहीं है, क्योंकि हमारे अन्तःकरण में तो केवल इनसे संबंध जोड़ने की आकांक्षा है। किसी रसिक भक्त ने प्रश्न कर दिया कि यदि सीताजी से विवाह होगा तब तो विदेहनन्दिनी से श्रीराम का नाता जुड़ेगा, तुम्हारा संबंध तो जुड़ेगा नहीं; और आप लोगों को तो स्वयं का नाता जोड़ना चाहिए, न कि जनकनन्दिनी का ? तो सखियाँ कहती हैं कि ना-ना ! इन्हें देखकर तो हमारे अन्तःकरण में यह निश्चय हो गया कि इनसे सीधे नाता नहीं जोड़ना चाहिए, अपितु श्रीराम से संबंध तो विदेहनन्दिनी के माध्यम से ही जोड़ना उचित रहेगा। जनकपुरवासिनी स्त्रियों को यह भलीभाँति ज्ञात है कि ईश्वर से यदि संबंध जुड़ेगा तो श्रीसीताजी के नाते से ही जुड़ेगा, सीधे हमारे नाते से नहीं। अगर भक्ति-स्वरूपा श्रीजानकीजी से हमारा नाता नहीं होगा तो समस्त विशेषताओं के होते हुए भी हम लोग प्रभु को आकृष्ट करने में समर्थ नहीं होंगे। इस विवाह का मुख्य तात्पर्य है जीव और ईश्वर में संबंध स्थापित करना, और संबंध स्थापित करने के लिए जिस मूल केन्द्र की अपेक्षा है वही जनकनन्दिनी श्रीसीता हैं।
Thursday, 1 December 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
....कल से आगे .....
भगवान राम ने मनुष्य के समान आचरण करते हुए हमें और आपको संकेत दिया कि जब कभी जीवन में मार्ग की समस्या आये तो हम क्या करें ? प्रभु से पूछा गया कि पहले कभी आपने यह प्रश्न क्यों नहीं किया ? प्रभु ने कहा - भई ! पहली यात्रा में तो गुरु विश्वामित्र साथ थे, इसलिए हमें मार्ग ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं थी । पर इस समय हमें मार्ग दिखाने वाले की आवश्यकता है । भगवान कहते हैं - जब कभी जीवन में द्विविधा आये, मार्ग के विषय में कोई प्रश्न उत्पन्न हो, तो त्रिवेणी के तट पर चले जाइए और भरद्वाज को ढूँढ़िये, तथा त्रिवेणी के तट पर भरद्वाज जी से जिज्ञासा कीजिए कि जीवन का मार्ग कौन-सा है ? महर्षि बाल्मीकि के आश्रम में पहुँच जाइये और उनसे प्रश्न पूछिये कि जीवन का लक्ष्य क्या है ? अभिप्राय यह है कि प्रभु श्रीराम की ईश्वर के रूप में पूजा कीजिए, मनुष्य के रूप में उनके चरित्र को ह्रदयंगम कीजिये । भगवान राम ईश्वरत्व और मनुष्यत्व के बीच में सेतु हैं । ईश्वर हैं, ठीक है, लेकिन ईश्वर होने से ही काम हीं बना इसलिए मनुष्य बने । और मनुष्य हैं, यह भी अधूरी बात है क्योंकि उसमें भी ईश्वर के बिना पूर्णता नहीं है । भगवान राम और तत्वज्ञ मुनि में जो मीठा वार्तालाप हुआ इस प्रश्न को लेकर, तथा इसका जो समाधान दिया गया उसकी चर्चा हम आगे करेंगे ।
भगवान राम ने मनुष्य के समान आचरण करते हुए हमें और आपको संकेत दिया कि जब कभी जीवन में मार्ग की समस्या आये तो हम क्या करें ? प्रभु से पूछा गया कि पहले कभी आपने यह प्रश्न क्यों नहीं किया ? प्रभु ने कहा - भई ! पहली यात्रा में तो गुरु विश्वामित्र साथ थे, इसलिए हमें मार्ग ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं थी । पर इस समय हमें मार्ग दिखाने वाले की आवश्यकता है । भगवान कहते हैं - जब कभी जीवन में द्विविधा आये, मार्ग के विषय में कोई प्रश्न उत्पन्न हो, तो त्रिवेणी के तट पर चले जाइए और भरद्वाज को ढूँढ़िये, तथा त्रिवेणी के तट पर भरद्वाज जी से जिज्ञासा कीजिए कि जीवन का मार्ग कौन-सा है ? महर्षि बाल्मीकि के आश्रम में पहुँच जाइये और उनसे प्रश्न पूछिये कि जीवन का लक्ष्य क्या है ? अभिप्राय यह है कि प्रभु श्रीराम की ईश्वर के रूप में पूजा कीजिए, मनुष्य के रूप में उनके चरित्र को ह्रदयंगम कीजिये । भगवान राम ईश्वरत्व और मनुष्यत्व के बीच में सेतु हैं । ईश्वर हैं, ठीक है, लेकिन ईश्वर होने से ही काम हीं बना इसलिए मनुष्य बने । और मनुष्य हैं, यह भी अधूरी बात है क्योंकि उसमें भी ईश्वर के बिना पूर्णता नहीं है । भगवान राम और तत्वज्ञ मुनि में जो मीठा वार्तालाप हुआ इस प्रश्न को लेकर, तथा इसका जो समाधान दिया गया उसकी चर्चा हम आगे करेंगे ।
Subscribe to:
Comments (Atom)