Saturday, 24 December 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

...कल से आगे......
रामायण में बताया गया है कि यद्यपि संसार में अनेक श्रेष्ठ मार्ग हैं पर चार प्रकार के मार्ग और भी हैं, और वे चार मार्ग हैं - काम, क्रोध, मद और लोभ के । लेकिन इन विकारों की सड़कें कहाँ ले जाती हैं ? तो इसका उत्तर देते हुए बताया गया कि अगर कोई नर्क तक पहुँचना चाहता हो तो उसे काम, क्रोध, मद और लोभ की सड़क से यात्रा करनी चाहिए । नारद जी इस समय क्रोध से भरे हुए हैं इसका अर्थ हुआ कि वे क्रोध के मार्ग पर चल रहे हैं । भगवान ने व्यंग्य भरे स्वर में पूछा - महाराज ! आप इस नरक वाली सड़क पर कैसे चले जा रहे हैं ? यह तो बैकुंठ वाली सड़क नहीं है । क्रोध लेकर कोई बैकुंठ में थोड़े ही जाता है ? अन्तःकरण के दोष जब मिट जाते हैं तब व्यक्ति बैकुंठ में प्रवेश पाता है । तो दोषों को छोड़कर जिस लोक में पहुँचा जाता है वहाँ पर आप इन मार्गों से नहीं जा सकते । अभी आप विश्वमोहिनी को पाने की चेष्टा की तो आप काम के मार्ग पर चल रहे थे और इस समय जब आप क्रोध से तमतमा रहे हैं, आपकी भौंहें फड़क रही हैं, तो आप क्रोध के मार्ग से चल रहे हैं । इसी से मैं समझ गया कि आप स्वस्थ नहीं हैं, क्योंकि अगर स्वस्थ होते तो आप कदापि इस मार्ग से बैकुंठ जाने का प्रयास नहीं करते ।

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