गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को विराट रूप दिखाते हैं और विराट रूप देखने के लिए भगवान अर्जुन को दिव्य दृष्टि भी देते हैं । तो भई ! जब भगवान ने अर्जुन को विराट रूप दिखा दिया और दिव्य दृष्टि दे ही दी तो फिर अर्जुन की वह दिव्य दृष्टि यदि जीवन भर बनी रहती, तो क्या बुराई थी ? उसे एक बार देकर पुनः वापस लौटा लेने की क्या आवश्यकता थी ? इसका क्या अभिप्राय है ? उसका भी मूल तत्व यही है कि विराट रूप का दर्शन कराकर भगवान ने अर्जुन को सत्य का साक्षात्कार कराया, साध्य का ज्ञान कराया । इसका अभिप्राय है कि जब हम ईश्वर के तत्व को जान लेते हैं, तो हमारे जीवन का जो साध्य तत्व है, जिसे हमें पाना है, उसका हमें बोध हो जाता है और साध्य तत्व का यह ज्ञान जीवन का महान फल है, तथा उस साध्य तत्व के ज्ञान के लिए ही भगवान ने अर्जुन को ज्ञानमयी दृष्टि दी । लेकिन भगवान ने तुरन्त वह दृष्टि वापस लौटा दी । परन्तु क्यों लौटा ली बस यही सबसे महत्वपूर्ण बात है । विराट रूप दिखाने के पश्चात भगवान ने अर्जुन की ओर देखा और बोले - अर्जुन ! कैसा लगा तुम्हें ? अर्जुन बोले - महाराज ! समस्या का समाधान हो गया । क्योंकि मैं लड़ने से ही डर रहा था, पर जब देख लिया कि ये सब मरे हुए हैं तब अब तो लड़ने की आवश्यकता नहीं है । बस भई ! यही सबसे बड़ी कठिनाई है । जिस आँख से साध्य का बोध हुआ, अर्जुन अगर उसी आँख से देखता रहे तब न तो वह धनुष उठायेगा, और न ही लड़ेगा । क्योंकि उसको तो दिखायी दे रहा है कि ये सब के सब मरे हुए हैं । याद रखियेगा, सर्वत्र यही समस्या है । रामायण में भी यदि सर्वत्र श्रीराम के केवल ईश्वरत्व का ही प्रतिपादन कर दिया जाए तो साधना का जो तत्व मनुष्य के जीवन में प्रकट करना चाहते हैं, वह संभव नहीं होगा । क्योंकि विराट की अनुभूति तथा विराट की दृष्टि के द्वारा तत्वज्ञान तो होता है पर व्यवहार नहीं चलता । व्यवहार जब चलेगा तो ससीम दृष्टि से ही चलेगा, असीम दृष्टि से नहीं चलेगा ।
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