Monday, 19 December 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

आप यदि विचार करके देखें तो आपको लगेगा कि महर्षि भरद्वाज से मार्ग के विषय में प्रश्न कर श्री राघवेन्द्र ने वही कृपा की जो प्रार्थना तुलसीदास जी कर रहे थे । जीव भटका हुआ था, ईश्वर के पास पहुँच नहीं रहा था, किन्तु भगवान स्वयं मनुष्य बनकर अवतरित हो गये । तथा वे स्वयं यात्री बन गये । और यात्री बनकर जीवन के जो विविध प्रश्न थे, उन सबका समाधान दिया । तो यह जो भरद्वाज जी से भगवान का वार्तालाप है, वह भी हमारे जीवन का प्रश्न है । और भई ! यह प्रश्न तो बड़ा पुराना है । महाभारत में भी यही प्रश्न आपको मिलेगा, जो भगवान राम का है । यहाँ पर भगवान राम ने महर्षि भरद्वाज से यह नहीं बताया कि कहाँ जाना है । ज्ञान की दृष्टि से इसलिए नहीं बताया कि वे स्वयं ईश्वर हैं । पर अगर साधना की दृष्टि से देखें तो इसका अभिप्राय है कि भगवान श्रीराघवेन्द्र ने कहा - महाराज ! मैं इसलिए नहीं बता रहा हूँ कि मुझे अपने लक्ष्य का ही पता नहीं है कि कहाँ जाना है, क्योंकि मैं तो अल्पज्ञ जीव हूँ । तो आप ही लक्ष्य बताइए और आप ही मार्ग बताइए । इसका अभिप्राय है कि जीवन-पथ में जब कभी यह दुविधा उत्पन्न हो कि सही मार्ग कौन-सा है, जीवन में कैसे चलें कि जिससे अपने लक्ष्य तक पहुँच जायँ ? तो हमें रामचरितमानस एवं महाभारत के इन दृष्टांतों के द्वारा उस दुविधा का निराकरण करना चाहिए ।

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