आप यदि विचार करके देखें तो आपको लगेगा कि महर्षि भरद्वाज से मार्ग के विषय में प्रश्न कर श्री राघवेन्द्र ने वही कृपा की जो प्रार्थना तुलसीदास जी कर रहे थे । जीव भटका हुआ था, ईश्वर के पास पहुँच नहीं रहा था, किन्तु भगवान स्वयं मनुष्य बनकर अवतरित हो गये । तथा वे स्वयं यात्री बन गये । और यात्री बनकर जीवन के जो विविध प्रश्न थे, उन सबका समाधान दिया । तो यह जो भरद्वाज जी से भगवान का वार्तालाप है, वह भी हमारे जीवन का प्रश्न है । और भई ! यह प्रश्न तो बड़ा पुराना है । महाभारत में भी यही प्रश्न आपको मिलेगा, जो भगवान राम का है । यहाँ पर भगवान राम ने महर्षि भरद्वाज से यह नहीं बताया कि कहाँ जाना है । ज्ञान की दृष्टि से इसलिए नहीं बताया कि वे स्वयं ईश्वर हैं । पर अगर साधना की दृष्टि से देखें तो इसका अभिप्राय है कि भगवान श्रीराघवेन्द्र ने कहा - महाराज ! मैं इसलिए नहीं बता रहा हूँ कि मुझे अपने लक्ष्य का ही पता नहीं है कि कहाँ जाना है, क्योंकि मैं तो अल्पज्ञ जीव हूँ । तो आप ही लक्ष्य बताइए और आप ही मार्ग बताइए । इसका अभिप्राय है कि जीवन-पथ में जब कभी यह दुविधा उत्पन्न हो कि सही मार्ग कौन-सा है, जीवन में कैसे चलें कि जिससे अपने लक्ष्य तक पहुँच जायँ ? तो हमें रामचरितमानस एवं महाभारत के इन दृष्टांतों के द्वारा उस दुविधा का निराकरण करना चाहिए ।
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