Sunday, 11 December 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

जब भगवान राम महर्षि भरद्वाज से पूछ रहे थे - कहहू नाथ हम केहि मग जाहीं - आप बताइए मैं किस मार्ग से जाऊँ, तो इस समय भगवान राम के प्रिय सखा निषाद भी साथ में थे, और प्रभु का यह वाक्य सुनकर निषादराज तो आश्चर्य से प्रभु का मुँह ताकने लगे । क्योंकि गंगा पार उतारने के बाद निषादराज ने प्रभु से कहा कि आप मुझे साथ में ले लीजिए । प्रभु ने कहा, आप क्यों कष्ट करना चाहते हैं ? तो उन्होंने कहा, महाराज ! मैं आपके साथ रहकर आपको मार्ग दिखाऊँगा । अब आप जरा सोचिए कि जो व्यक्ति आपके साथ यह कहकर चला हो कि मैं आपको मार्ग दिखाऊँगा और उसी के सामने आप किसी दूसरे से पूछने लगें कि भाई ! सही-सही मार्ग बताओ तो इसका सीधा अर्थ यही हुआ कि मार्ग दिखाने वाले उस व्यक्ति पर आपको विश्वास नहीं है । और जब वे कह चुके हैं तो भी भगवान श्रीराघवेन्द्र पूछते क्यों हैं ? गोस्वामीजी का तात्पर्य है कि भगवान राम की यह यात्रा वस्तुतः हमारी और आपकी जीवन यात्रा है । जो समस्याएँ भगवान राम के जीवन में आयीं, हमारे और आपके जीवन की यात्रा में ऐसी समस्याएँ आती हैं । इसलिए अयोध्याकाण्ड में जब गोस्वामीजी तीनों यात्रियों के चलने की पद्धति, उनके प्रश्न, उनकी जिज्ञासा, उनका विश्राम तथा उनका दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं तब इसका फल क्या होना चाहिए ? गोस्वामीजी संकेत करते हुए कहते हैं कि इन तीनों पथिकों की यात्रा को जिन्होंने पूरा समझ लिया है उसके जीवन में उसका प्रभाव यह होता है कि वे संसार-पथ को अत्यंत सरलता से पूरा कर लेते हैं ।

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