गत 2 दिसम्बर के प्रसंग से आगे.....
श्री राघवेन्द्र और महर्षि भरद्वाज में जो अनोखा वार्तालाप हुआ, वस्तुतः उसमें ईश्वरत्व और मनुष्यत्व दोनों तत्वों का अनोखा समन्वय विद्यमान है । भगवान श्रीराम का जो प्रश्न है उस प्रश्न को पढ़कर ऐसा नहीं लगता है कि यह प्रश्न ईश्वर के द्वारा किया गया है । यह प्रश्न तो एक मनुष्य का, एक जिज्ञासु का प्रश्न प्रतीत हो रहा है । और महर्षि ने प्रारंभ में तो - सुगम सकल मग तुम्ह कहँ अहहीं । - वाक्य के द्वारा सांकेतिक भाषा में श्रीराम के ईश्वरत्व की ओर संकेत कर दिया, लेकिन ईश्वरत्व की ओर संकेत करने के बाद यदि वे कहीं रुक जाते कि तुम्हें मार्ग बताने की आवश्यकता नहीं है, या यह कह देते कि तुम तो साक्षात ब्रह्म हो, तुम्हें मार्ग कौन दिखा सकता है तो लगता कि प्रारंभ में जो उन्होंने कहा था उसी का अन्त तक निर्वाह किया । लेकिन प्रारंभ में श्रीराम की ईश्वरता की ओर संकेत करने के बाद भगवान श्रीराघवेन्द्र के मार्गदर्शन के लिए उन्होंने विद्यार्थियों को बुलाया और वे विद्यार्थीगण मार्ग दिखाते हुए भगवान को लेकर गये ।
......आगे कल ....
श्री राघवेन्द्र और महर्षि भरद्वाज में जो अनोखा वार्तालाप हुआ, वस्तुतः उसमें ईश्वरत्व और मनुष्यत्व दोनों तत्वों का अनोखा समन्वय विद्यमान है । भगवान श्रीराम का जो प्रश्न है उस प्रश्न को पढ़कर ऐसा नहीं लगता है कि यह प्रश्न ईश्वर के द्वारा किया गया है । यह प्रश्न तो एक मनुष्य का, एक जिज्ञासु का प्रश्न प्रतीत हो रहा है । और महर्षि ने प्रारंभ में तो - सुगम सकल मग तुम्ह कहँ अहहीं । - वाक्य के द्वारा सांकेतिक भाषा में श्रीराम के ईश्वरत्व की ओर संकेत कर दिया, लेकिन ईश्वरत्व की ओर संकेत करने के बाद यदि वे कहीं रुक जाते कि तुम्हें मार्ग बताने की आवश्यकता नहीं है, या यह कह देते कि तुम तो साक्षात ब्रह्म हो, तुम्हें मार्ग कौन दिखा सकता है तो लगता कि प्रारंभ में जो उन्होंने कहा था उसी का अन्त तक निर्वाह किया । लेकिन प्रारंभ में श्रीराम की ईश्वरता की ओर संकेत करने के बाद भगवान श्रीराघवेन्द्र के मार्गदर्शन के लिए उन्होंने विद्यार्थियों को बुलाया और वे विद्यार्थीगण मार्ग दिखाते हुए भगवान को लेकर गये ।
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