Tuesday, 13 December 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

विनय-पत्रिका के एक पद में गोस्वामीजी जीवन यात्रा पर एक व्यंग्यात्मक चित्र प्रस्तुत करते हुए यात्रियों को सावधान कर रहे हैं - राम कहत चलु, राम कहत चलु, राम कहत चलु भाई रे । नाहीं तौ भव-बेगारि महँ परिहै ।। उन्होंने कहा - राम कहते चलो, राम कहते चलो । क्यों ? यदि न कहें तो क्या हानि होगी ? बोले - भई ! नहीं तो बेगार में पकड़ लिये जाओगे । बेगार की परम्परा अब तो देश में रही नहीं, लेकिन पहले थी । राजा-महाराजा या जमींदार होते थे । वे गाँव के लोगों को काम पर बुलाते थे । पर उस काम के बदले में मजदूरी नहीं दी जाती थी । कहा जाता था कि प्रजा होने के नाते यह तुम्हारा कर्तव्य था, तो तुमसे कर्तव्य का पालन कराया गया है, इसकी मजदूरी नहीं दी जायेगी । बेगार शब्द का अर्थ होता है कि जहाँ काम तो करना पड़ता है परन्तु मजदूरी प्राप्त नहीं होती । इसलिए गोस्वामीजी ने व्यंग्य किया कि अगर राम का नाम नहीं लोगे तो संसार वाले अपने-अपने बेगार में पकड़े बिना छोडेंगे नहीं । संसार वाले अपना काम तो ले लेंगे पर बदले में मजदूरी कुछ भी नहीं देंगे । इसलिए राम कहत चलु माने ? अगर कोई पकड़ने की चेष्टा करे और वह व्यक्ति बता दे कि हम आपके राज्य की प्रजा नहीं हैं, हम तो दूसरे राज्य की प्रजा हैं, तो दूसरा व्यक्ति छोड़ देगा कि भाई ! वह तो हमसे बड़ा राजा है, उसकी प्रजा हो तो बेगार लेने का अधिकार हमें नहीं है । गोस्वामीजी ने कहा - जब राम-राम कहते चलोगे, तो बेगार में पकड़ने वाले को याद दिला देना कि हम रामराज्य के नागरिक हैं, तुम्हारे राज्य के नागरिक नहीं हैं, तो बेगार से बच जाओगे । तो भई पहली सावधानी तो यह बरतो कि जब जीवन-यात्रा में चलो तो राम का नाम लेना मत भूलो ।

No comments:

Post a Comment