Friday, 9 December 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

शबरी जी से जब भगवान राम का संवाद होता है, तब भगवान पूछते हैं - शबरीजी ! क्या आप जनकनन्दिनी सीता जी की सूधि जानती हैं, आप बताइए कि जनकनन्दिनी सीता कहाँ हैं, कैसे मिलेंगी ? अब इसका सही उत्तर क्या है ? अगर इसका तात्विक उत्तर दिया जाय तो क्या शबरी जी इस तत्व को नहीं जानती हैं कि छाया सीता जी का अपहरण हुआ है ? वे भी कह सकती थीं कि न तो हरण हुआ है और न ही खोजने की आवश्यकता है । पर उन्होंने यह नहीं कहा और उसे यदि जाने भी दें तो इतना तो कह ही सकती हैं कि सर्वज्ञ ईश्वर मुझसे पूछ रहा है कि सीता जी कहाँ हैं ? यद्यपि भगवान श्रीराम के प्रश्न को सुनकर वे संकोच में गड़ गयी, परन्तु विनम्रतापूर्वक उन्हें यही कहना पड़ा - प्रभु ! आप पंपासर की यात्रा कीजिए, वहाँ आपकी सुग्रीव से मित्रता होगी । भरद्वाज जी कहते हैं - अच्छा ! आप इन विद्यार्थियों के पीछे जाइये । बाल्मीकि जी भी कहते हैं - अच्छा ! आप चित्रकूट में निवास कीजिए और शबरी जी कहती हैं कि आप सुग्रीव से मित्रता कीजिए । मानो ये जो मार्ग में मिलने वाले महापुरुष हैं, वे भगवान श्रीराघवेन्द्र के मनुष्यत्व का उद्देश्य समझते हैं कि श्रीराम वस्तुतः संसार के प्राणियों को, संसार के जीवों को, साधना का तत्व बताना चाहते हैं और साधना का सत्य बताने के लिए मानवीय जीवन में जो समस्याएँ आती हैं उन समस्याओं को भगवान श्रीराम ने अपने जीवन में स्वीकार किया तथा उनका मानवीय पद्धति से उन्होंने ऐसा समाधान बताया कि जिससे हमें और आपको साधना का सत्य मिले, तथा जीवन में सही-सही चलने की शिक्षा प्राप्त हो ।

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