शीलनिधि राजा ने जब अपनी कन्या विश्वमोहिनी का हाथ देखने के लिए नारद जी से कहा और विश्वमोहिनी का हाथ उन्होंने देखा तो उनके अन्तःकरण में वासना और कामना का जन्म हो गया । बाद में एक बार देवर्षि नारद ने भगवान पर मीठा उलाहना देते हुए कहा - प्रभु ! संसार में इतने व्यक्ति विवाह करते हैं, आप किसी के विवाह में बाधा नहीं देते हैं, परन्तु मेरे विवाह में बाधा देना आपको आवश्यक क्यों लगा ? प्रभु ने कहा - नारद ! विवाह का अर्थ है पाणिग्रहण संस्कार । जिसमें वर कन्या का हाथ पकड़ता है । भगवान ने व्यंग्य भरे स्वर में कहा कि जब तुमने हस्तरेखा देखने के लिए केवल कुछ क्षणों के लिए ही पाणिग्रहण किया तब तो तुम्हारी ऐसी शोचनीय स्थिति हो गयी, पर अगर तुम जीवन भर के लिए पाणिग्रहण करते तो न जाने क्या होता ? इसलिए मुझे लगा कि तुम्हें इस संस्कार से बचाया जाय ।
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