.....कल से आगे.....
इतिहास और भूगोल की एक दृष्टि यह है कि इतिहास में 'काल' को बड़ा महत्व दिया जाता है, और भूगोल में 'स्थान' को बड़ा महत्व प्राप्त है । पर हमारे आध्यात्मिक जगत में इतिहास और भूगोल का उपयोग मानव-जीवन के जो तात्विक अर्थ हैं उनको ग्रहण करने के लिए किया गया । वैसे हिमालय और विन्ध्याचल की भौतिक अवस्थिति से तो आप परिचित ही हैं । पर हिमालय और विन्ध्याचल का आध्यात्मिक अर्थ जो रामायण में किया गया है वह बड़ा सांकेतिक है और पुराणों से जुड़ा हुआ है । विन्ध्याचल की कथा जो पुराणों में आती है वह बड़े महत्व की है । विन्ध्याचल को जब यह पता चला कि सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करता है तो उसके मन में भी महत्वकांक्षा जागी । व्यक्ति के अन्तःकरण की जो महत्वकांक्षा है वही वस्तुतः विन्ध्याचल का रूप है । और यह महत्वकांक्षा दो रूपों में रामायण में वर्णित है । इस प्रसंग में प्रश्न यह है कि महत्वकांक्षा होनी चाहिए कि नहीं ? विन्ध्याचल की यात्रा करनी चाहिए कि नहीं ? तो भई ! यह कहना तो बड़ा सरल है कि व्यक्ति महत्वकांक्षा छोड़ दे । पर व्यवहार में उसे उतार पाना सरल नहीं है । वैसे महत्वाकांक्षा के दोनों प्रकार के परिणाम हमें दिखायी देते हैं अगर महत्वाकांक्षा गलत दिशा में मुड़ जाय तो व्यक्ति प्रतापभानु की तरह रावण बन जायेगा और यदि महत्वकांक्षा को सही दिशा मिल जाय तो व्यक्ति भक्त, संत और भगवान का अभिन्न अंश भी बन सकता है ।
इतिहास और भूगोल की एक दृष्टि यह है कि इतिहास में 'काल' को बड़ा महत्व दिया जाता है, और भूगोल में 'स्थान' को बड़ा महत्व प्राप्त है । पर हमारे आध्यात्मिक जगत में इतिहास और भूगोल का उपयोग मानव-जीवन के जो तात्विक अर्थ हैं उनको ग्रहण करने के लिए किया गया । वैसे हिमालय और विन्ध्याचल की भौतिक अवस्थिति से तो आप परिचित ही हैं । पर हिमालय और विन्ध्याचल का आध्यात्मिक अर्थ जो रामायण में किया गया है वह बड़ा सांकेतिक है और पुराणों से जुड़ा हुआ है । विन्ध्याचल की कथा जो पुराणों में आती है वह बड़े महत्व की है । विन्ध्याचल को जब यह पता चला कि सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करता है तो उसके मन में भी महत्वकांक्षा जागी । व्यक्ति के अन्तःकरण की जो महत्वकांक्षा है वही वस्तुतः विन्ध्याचल का रूप है । और यह महत्वकांक्षा दो रूपों में रामायण में वर्णित है । इस प्रसंग में प्रश्न यह है कि महत्वकांक्षा होनी चाहिए कि नहीं ? विन्ध्याचल की यात्रा करनी चाहिए कि नहीं ? तो भई ! यह कहना तो बड़ा सरल है कि व्यक्ति महत्वकांक्षा छोड़ दे । पर व्यवहार में उसे उतार पाना सरल नहीं है । वैसे महत्वाकांक्षा के दोनों प्रकार के परिणाम हमें दिखायी देते हैं अगर महत्वाकांक्षा गलत दिशा में मुड़ जाय तो व्यक्ति प्रतापभानु की तरह रावण बन जायेगा और यदि महत्वकांक्षा को सही दिशा मिल जाय तो व्यक्ति भक्त, संत और भगवान का अभिन्न अंश भी बन सकता है ।
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