Sunday, 25 December 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

जब नारद को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने निर्णय किया कि मैं भगवान के पास बैकुंठ चलूँगा, तब भगवान नारद को बीच रास्ते में रोक देते हैं, कि नारद ! सही लक्ष्य तक पहुँचने की इच्छा ही यथेष्ट नहीं है, इसके साथ-साथ व्यक्ति के जीवन में सही मार्ग की भी आवश्यकता है । मुझे लगता है कि तुम्हारा लक्ष्य बुरा नहीं है, पर तुम मार्ग से भटक गये हो । इसके पश्चात भगवान देवर्षि नारद से वार्तालाप करके उनको वहीं से लौटा देते हैं । इसका अभिप्राय है कि जीवन में किसी भी व्यक्ति का लक्ष्य बुरा नहीं है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति जीवन में सुख पाना चाहता है, शान्ति पाना चाहता है, परमानन्द पाना चाहता है । इसमें तो कोई भेद नहीं है पर उन्हें प्राप्त करने के लिए जिन साधनों का हम प्रयोग करते हैं उनसे अगर सुख के स्थान पर दुख का अनुभव हो रहा है तो इसका अर्थ हमें यही लेना चाहिए कि शायद हम सही मार्ग पर नहीं हैं और इस बात का हमें अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि इतना विलम्ब लगने पर भी अगर हम लक्ष्य तक नहीं पहुँच पा रहे हैं तो हमारा कर्तव्य है कि किसी मार्ग के विशेषज्ञ महापुरुष के चरणों का आश्रय लेकर हम उनसे पूछें कि मेरे लिए उपयुक्त मार्ग कौन-सा है ?  यह कृपा करके बताइए ।

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