.....कल से आगे.....
गोस्वामीजी ने कहा कि एक तो ऐसी डोली मिल गयी, और ऊपर से कहार विषम संख्या में मिल गये, और फिर जब वे अपनी-अपनी ओर खींचते हैं तो क्या होता है ? बोले - यात्री को चारों ओर से हिलाया जा रहा है और बेचारा यात्री उसमें परेशान हो रहा है । किसी ने गोस्वामीजी से कहा - कहार जब आपके हैं तो उन्हें डाँटना चाहिए, सेवक को वश में रहना चाहिए । उन्होंने कहा - बस ! कठिनाई तो यही है, क्योंकि जितना वेतन वे कहार चाहते हैं उतना वेतन यदि उन्हें दिया जायेगा तब तो वे वश में रहेंगे, अन्यथा वे उच्छृंखल हो सकते हैं । किन्तु जितना वेतन वे चाहते हैं, उतना तो हम दे नहीं पाते । इन्द्रियाँ जितना भोग चाहती हैं, उतना हम नहीं दे पाते । इसलिए ये हमारी बात नहीं मानती । तो किसी ने गोस्वामीजी से कहा कि महाराज ! आप इनसे वायदा कर दीजिए कि अभी तो हम पूरा वेतन नहीं दे पा रहे हैं, परन्तु जब हमारे गाँव पहुँचा दोगे तो तुम्हारा पूरा वेतन चुका देंगे । जो तुम्हारी इच्छा है वह पूरी कर देंगे । और तब तुलसीदास जी ने जो अन्तिम वाक्य कहा वह सबसे बड़ा व्यंग्य था । गोस्वामीजी ने कहा - भैया ! यही तो सबसे बड़ी समस्या है । क्योंकि एक डोली सड़ी हुई, कहार जो हैं वे विषम हैं । और चारों ओर खींच रहे हैं । मार्ग में मार्ग व्यय चुकाने के लिए द्रव्य नहीं है । पर सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमें यही याद नहीं है कि हमको जाना कहाँ है ? कहार यदि कहीं पूछ ही दें कि आपको कहाँ ले चलना है, यह तो बताइए ? तो उसका हमें पता ही नहीं है । इसका अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति से यदि पूछा जाय कि आपके जीवन का लक्ष्य क्या है तो वह भौंचक्का होकर देखेगा - अरे ! सचमुच जीवन का लक्ष्य क्या है इसका तो पता ही नहीं है । गोस्वामीजी ने कहा कि परिणाम यह होता है कि जब यात्री ऐसी यात्रा करें तो ज्यों-ज्यों वह चलेगा, त्यों-त्यों जन्म व्यतीत होंगे त्यों-त्यों व्यक्ति लक्ष्य से दूर होता जायेगा ।
गोस्वामीजी ने कहा कि एक तो ऐसी डोली मिल गयी, और ऊपर से कहार विषम संख्या में मिल गये, और फिर जब वे अपनी-अपनी ओर खींचते हैं तो क्या होता है ? बोले - यात्री को चारों ओर से हिलाया जा रहा है और बेचारा यात्री उसमें परेशान हो रहा है । किसी ने गोस्वामीजी से कहा - कहार जब आपके हैं तो उन्हें डाँटना चाहिए, सेवक को वश में रहना चाहिए । उन्होंने कहा - बस ! कठिनाई तो यही है, क्योंकि जितना वेतन वे कहार चाहते हैं उतना वेतन यदि उन्हें दिया जायेगा तब तो वे वश में रहेंगे, अन्यथा वे उच्छृंखल हो सकते हैं । किन्तु जितना वेतन वे चाहते हैं, उतना तो हम दे नहीं पाते । इन्द्रियाँ जितना भोग चाहती हैं, उतना हम नहीं दे पाते । इसलिए ये हमारी बात नहीं मानती । तो किसी ने गोस्वामीजी से कहा कि महाराज ! आप इनसे वायदा कर दीजिए कि अभी तो हम पूरा वेतन नहीं दे पा रहे हैं, परन्तु जब हमारे गाँव पहुँचा दोगे तो तुम्हारा पूरा वेतन चुका देंगे । जो तुम्हारी इच्छा है वह पूरी कर देंगे । और तब तुलसीदास जी ने जो अन्तिम वाक्य कहा वह सबसे बड़ा व्यंग्य था । गोस्वामीजी ने कहा - भैया ! यही तो सबसे बड़ी समस्या है । क्योंकि एक डोली सड़ी हुई, कहार जो हैं वे विषम हैं । और चारों ओर खींच रहे हैं । मार्ग में मार्ग व्यय चुकाने के लिए द्रव्य नहीं है । पर सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमें यही याद नहीं है कि हमको जाना कहाँ है ? कहार यदि कहीं पूछ ही दें कि आपको कहाँ ले चलना है, यह तो बताइए ? तो उसका हमें पता ही नहीं है । इसका अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति से यदि पूछा जाय कि आपके जीवन का लक्ष्य क्या है तो वह भौंचक्का होकर देखेगा - अरे ! सचमुच जीवन का लक्ष्य क्या है इसका तो पता ही नहीं है । गोस्वामीजी ने कहा कि परिणाम यह होता है कि जब यात्री ऐसी यात्रा करें तो ज्यों-ज्यों वह चलेगा, त्यों-त्यों जन्म व्यतीत होंगे त्यों-त्यों व्यक्ति लक्ष्य से दूर होता जायेगा ।
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