Monday, 5 December 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

....कल से आगे.....
महर्षि भरद्वाज पहले भगवान राम से सांकेतिक भाषा में यह कहते हैं कि आप तो साक्षात ईश्वर हैं । इसलिए मार्ग का प्रश्न ही कहाँ है ? जो साध्य तत्व है उसके लिए भला मार्ग की क्या आवश्यकता है ? और आगे चलकर भगवान राम जब महर्षि बाल्मीकि से पूछते हैं कि मैं कहाँ रहूँ तो प्रारंभिक उत्तर में वहाँ भी आप वे ही दोनों बातें पायेंगे, जो परस्पर विरोधी हैं । भरद्वाज की बात भी परस्पर विरोधी है, क्योंकि भगवान को पहले मार्ग न बताना और बाद में मार्गदर्शन देना । भगवान राम ने बाल्मीकि जी से कहा - मैं कहाँ रहूँ आप बताइए, तब पहले तो महर्षि मुस्कराने लगे और कुछ देर उत्तर देने से रुक गये । परन्तु प्रभु ने आश्चर्य से मुनि की ओर देखा - महाराज ! इस नन्हे से प्रश्न का उत्तर देने में इतना विलम्ब क्यों लग रहा है । तो महर्षि ने तुरन्त कहा - पहले आप यह बता दीजिए कि आप कहाँ नहीं हैं ? जब आप बता देंगे कि यहाँ नहीं है, तो हम कह देंगे कि अमुक स्थान पर रहिए । बाल्मीकि जी के ऐसा कहने के बाद भगवान राम ने उनके प्रश्न का उत्तर नहीं दिया । भगवान श्रीराघवेन्द्र ने नहीं बताया कि मैं कहाँ हूँ, किन्तु भगवान राम का उत्तर बिना सुने ही महर्षि बाल्मीकि ने कहना प्रारंभ कर दिया - राम ! अब मैं आपको वे स्थान बता रहा हूँ जहाँ आप श्री सीताजी तथा लक्ष्मण जी के साथ निवास कीजिए । तो क्या ये परस्पर विरोधी बातें नहीं लगती ? महर्षि भरद्वाज और महर्षि बाल्मीकि के कथन का सामंजस्य यह है कि साध्य तत्व के ज्ञान के बिना तो ये विराट दृष्टि तत्वज्ञान के लिए उपयोगी है, पर अगर विराट दृष्टि सर्वदा बनी रहे तो साधना होना समाप्त हो जायेगा । विराट तत्व का जो बोध है, ईश्वरत्व का बोध है, उसके द्वारा मनुष्य के जीवन में ज्ञान की उपलब्धि तो हो जायेगी, साध्य पक्ष की अनुभूति तो हो जायेगी पर साधन की स्थिति नहीं बन पायेगी । गीता और रामचरितमानस दोनों ही ग्रन्थों से हम इसके दृष्टांत ले सकते हैं ।

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