देवर्षि नारद के प्रसंग में सबसे पहले संग से कामना उत्पन्न हुई, उसके पश्चात अत्यंत क्रोध आया और तब उन्होंने निर्णय किया कि मैं भगवान के पास चलूँगा - इतना सोचकर वे भगवान के पास तीव्र गति से चले । वैसे, पहली बार जब नारद गये थे तो बैकुंठ लोक में ही भगवान मिले थे और अब भी भगवान उनको बैकुंठ में ही मिल सकते थे, पर वहाँ पर लिखा हुआ है कि - नारद जी को बीच मार्ग में ही भगवान खड़े हुए मिल गये । यहाँ बीच में मिलने की क्या आवश्यकता थी ? नारद उतावले हो रहे थे, यह तो समझ में आता है, पर भगवान को ऐसी क्या शीघ्रता थी ? और इतना ही नहीं भगवान का प्रश्न तो और भी विचित्र था । भगवान ने नारद को प्रणाम करके जब उनसे प्रश्न किया तो नारद के क्रोध की सीमा नहीं रही । भगवान ने नारद जी से कहा - महाराज ! आप कहाँ जा रहे हैं ? और एक शब्द उसके साथ जुड़ा हुआ था कि आप जा तो रहे हैं, यह तो मैं देख रहा हूँ, पर आपको देखकर ऐसा लग रहा है कि आप कुछ अस्वस्थ हैं, व्याकुल हैं । अब तो नारद का क्रोध चौगुना बढ़ गया कि मुझे बंदर की आकृति इन्होंने दी, मेरा विवाह इन्होंने होने नहीं दिया, और यह भी जानते हैं कि मैं इन्हीं के पास चलकर जा रहा हूँ पर इतने भोले बनकर पूछ रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं कि जैसे इन्हें कुछ पता ही न हो । परन्तु भगवान का बीच मार्ग मिलकर प्रश्न करने का अभिप्राय यह था कि जैसे आपको पता हो कि आपका कोई प्रिय व्यक्ति मार्ग भूल गया हो और वह भटककर गलत दिशा में जा रहा हो तो आप उसे बीच मार्ग में ही मिलें, क्योंकि ऐसा न होने पर वह बड़ी लम्बी यात्रा करके भटक कर न जाने कहाँ चला जायेगा ? तो उचित यही होगा कि आप ही उस तक पहुँच जायँ । इसलिए भगवान स्वयं ही नारद के पास पहुँच गये और उनसे प्रश्न पूछने में व्यंग्य यह था कि नारद ! तुम बैकुंठ लोक में जाना चाहते हो, मुझ तक पहुँचना चाहते हो यह तो मैं जानता हूँ, पर जिस सड़क से तुम जा रहे हो क्या सचमुच यह सड़क बैकुंठ लोक तक जाती है ?
.....आगे कल ....
.....आगे कल ....
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