Saturday, 10 December 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

भगवान श्रीराम ने मानवीय समस्याओं को जिस प्रकार स्वीकार किया उसे गोस्वामीजी ने सूत्र के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा कि अयोध्या से लेकर भगवान श्रीराम की चित्रकूट तक की यात्रा, या चित्रकूट से दण्डकारण्य तक की, अथवा दण्डकारण्य से लंका की यह जो यात्रा है, इस यात्रा की आवश्यकता है क्या ? इस यात्रा के बिना रामराज्य बन सकता था कि नहीं ? और रामराज्य बनाने के लिए तो महाराज श्री दशरथ ने गुरु वसिष्ठ को संदेश भेज ही दिया था कि कल अयोध्या के राजसिंहासन पर मैं श्रीराघवेन्द्र को अभिषिक्त करूँगा । तो फिर श्रीराम सिंहासन पर बैठ जाते और रामराज्य बन जाता । पर भगवान श्रीराम उस मार्ग को स्वीकार नहीं करते, बल्कि रामराज्य में विघ्न आ जाता है । तो, यह विध्न जो है वह ईश्वरत्व का लक्षण है या मनुष्यत्व का ? भला ईश्वर के जीवन में विध्न कैसा ? पर श्रीराम अपने जीवन में विध्न स्वीकार करते हैं । इसका अभिप्राय है कि उन्होंने अपने आपको मनुष्य के रूप में प्रस्तुत किया । गोस्वामीजी कहते हैं कि यह जो भगवान श्रीराम की यात्रा है, उस यात्रा का एक विशेष उद्देश्य है । और वह उद्देश्य क्या है ? यह हमें आगे चलकर दिखायी देता है ।

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