Friday, 16 December 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

विनय-पत्रिका के इस पद - राम कहत चलु ....- में गोस्वामीजी ने आगे कहा कि कुटिल करमचंद जी ने ऐसा दान (शरीर) दे दिया कि न तो इसको बदल सकते हैं, न ही छोड़ सकते हैं । बल्कि जीवन भर उसी की सेवा में लगे रहते हैं । किसी ने कहा कोई बात नहीं, अगर डोली बुरी भी है तो क्या बात है, अभी तो काम चलाइए । गोस्वामीजी ने कहा कि अभी तो इसका पूरा वर्णन और सुन लीजिए । क्योंकि जो डोली होती है उसमें ढोने वाले लगाये जाते हैं दो या चार । एक आगे, एक पीछे या दो आगे और दो पीछे । किन्तु यह जो डोली करमचंद जी ने दी है, इसमें कहार भी लगे हुए हैं, तो ग्यारह । अब किस तरफ किसको लगायें, इसका बँटवारा कैसे करें ? अगर दस भी होते, तो पाँच-पाँच दोंनो ओर लगा देते, पर जहाँ ग्यारह हों उनको कहाँ-कहाँ खड़ा करें ? ग्यारह कहार का अर्थ है पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक मन । इन्हीं ग्यारह कहारों के द्वारा हमारा शरीर चल रहा है । गोस्वामीजी कहते हैं कि इस यात्रा में जीव को महान कष्ट होता है क्योंकि संसार में कहार जब चलेंगे तब एक ही दिशा में यात्री को लेकर चलेंगे । लेकिन यहाँ, जितने भी कहार हैं वे सब अपनी-अपनी ओर खींच रहे हैं । आँख अपनी ओर, कान अपनी ओर, चिह्वा अपनी ओर, नाक अपनी ओर तथा त्वचा अपनी ओर । इस प्रकार सारे कहार अपनी-अपनी ओर खींच रहे हैं । और यह मन वाला कहार तो इतना विकट है कि यह कब किधर उछलकर लग जायेगा इसका कोई पता नहीं । यह सर्वदा स्थान ही बदलता रहता है । कभी आँख के साथ, कभी कान के साथ, कभी जिह्वा के साथ, जब देखिए तब उछल रहा है ।
    .......आगे कल .....

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