भगवान श्रीराघवेन्द्र ने मार्ग के संबंध में जिज्ञासा कहाँ और किससे की वह बड़े महत्व की बात है । भगवान श्रीराम के समक्ष चित्रकूट यात्रा का प्रश्न है और चित्रकूट जो है वह विन्ध्याचल का एक अंग है और प्रतापभानु के जीवन की जो यात्रा थी वह भी विन्ध्याचल की ही यात्रा थी । इस प्रकार दोनों की यात्राएँ विन्ध्याचल की हैं । रामायण में वर्णन आता है कि सारे संसार पर अधिकार कर लेने के पश्चात प्रतापभानु के मन में एक दिन विन्ध्याचल की यात्रा का संकल्प जाग्रत हुआ । विन्ध्याचल पर्वत में तथा उसके आसपास सघन वन है । गोस्वामीजी कहते हैं - प्रतापभानु जो था वह विन्ध्याचल के गम्भीर वन में गया और यहाँ पर भगवान श्रीराम की यात्रा भी विन्ध्याचल की ओर ही है तथा चित्रकूट भी वन ही है पर इसके सांकेतिक अर्थ क्या है ? आने वाले दिनों में हम इस पर विचार करेंगे ।
......आगे कल.....
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