वस्तुतः संसार में जितने जीव हैं वे सब तो यात्री हैं । और यह यात्रा इतनी लम्बी है कि न जाने कितने जन्मों से चल रही है । और न जाने कितने जन्मों तक चलती जायेगी । लेकिन कुछ विडम्बना इस यात्रा के साथ यह जुड़ी हुई है, जिसका अनुभव शायद प्रत्येक व्यक्ति को होता होगा कि हम और आप जब भौतिक यात्रा करते हैं, उसमें ज्यों-ज्यों समय व्यतीत होता जाता है आप यह सोचकर प्रसन्न होते हैं कि हम गंतव्य के निकट पहुँचते जा रहे हैं, और अन्त में यह संतोष होता है कि हम जहाँ पहुँचना चाहते थे, पहुँच गये । पर अगर हम और आप आंतरिक दृष्टि से विचार करके देखें कि जीवन यात्रा के संदर्भ में भी क्या यही अनुभव हमें और आपको हो रहा है ? इसका अभिप्राय है कि बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था तक ज्यों-ज्यों हम बढ़ते जाते हैं, तो क्या सचमुच हमें यह लगने लगता है कि जीवन के लक्ष्य के पास हम पहुँच गये ? गोस्वामीजी ने विनय-पत्रिका में कहा है कि सांसारिक यात्रा और जीवन यात्रा में अन्तर यह है कि सांसारिक यात्रा में समय बीतने के साथ हम अपने लक्ष्य के पास पहुँचते हैं, परन्तु हमारी जीवन यात्रा में ठीक उल्टी बात यह हो गयी कि ज्यों-ज्यों हम चल रहे हैं त्यों-त्यों हमारा लक्ष्य हमसे दूर हो रहा है । इसका अभिप्राय है कि लड़कपन में जो आनन्द था, बूढ़े होते-होते वह आनंद बढ़ गया है या खो गया है ? इसका उत्तर यही है कि वह आनन्द खो गया है । और अगर आनन्द खो गया है, चिन्ताएं बढ़ गयी हैं तो इससे सिद्ध हो रहा है कि हम लक्ष्य के पास नहीं पहुँचे बल्कि दूर होते गये । हम सबकी जीवन-यात्रा में यह जो विचित्रता है गोस्वामीजी ने इसका रामायण और विनय-पत्रिका के अनेकों प्रसंगों में बड़ा सुन्दर वर्णन किया है ।
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