गोस्वामीजी कहते हैं कि भगवान राम की जो चित्रकूट यात्रा है उसमें जिस क्रम से भगवान श्रीराम जिज्ञासा प्रकट करते हैं, तथा उसके बाद जिस क्रम से यात्रा करते हैं, हम और आप भी अगर उसी क्रम से जिज्ञासा करते हुए उस पथ पर चलें, जिस पर वे तीनों यात्री चले थे तो गोस्वामीजी विश्वास दिलाते हैं कि आप भगवान श्रीराम के धाम का मार्ग अवश्य प्राप्त कर लेंगे । श्रीराम कौन हैं ? वसिष्ठ जी ने उनके नाम का अर्थ बताते हुए कहते हैं - जो आनंद का समुद्र है, जो सुख की मूर्तिमान निधी है, जो समस्त प्राणियों को विश्राम देने वाला है, वही राम है । इसका अभिप्राय है कि एक यात्रा पथ वह है जिससे चलकर व्यक्ति श्रीराम से मिलकर रामत्व को पा लेता है । रामधाम का अर्थ राम में एकत्व पा लेना है । और दूसरी ओर एक यात्रा वह भी है जिस यात्रा के प्रारंभ में यात्री मनुष्य रूप होते हुए भी उस पथ पर चलते हुए राक्षस बन जायेगा, रावण बन जायेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है । इन दोनों मार्गों की तुलना करके गोस्वामीजी मानो संकेत देना चाहते हैं कि हम चाहें तो या तो प्रथम मार्ग को स्वीकार करके रामत्व की दिशा में बढ़ें या मनुष्य से रावणत्व की दिशा में बढ़ें, राक्षसत्व की दिशा में बढें । अब यह तो हमें और आपको निर्णय करना है कि हम कौन सा मार्ग अपने लिए चुनते हैं ।
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