विनय-पत्रिका के इस पद 'राम कहत चलु....' में अंत में गोस्वामीजी प्रभु से कहते हैं - महाराज ! यात्री भटक रहा हो और उसे याद न हो कि कहाँ जाना है, लेकिन जिसके यहाँ जाना हो कहीं वही आ जाय और आकर कहे कि अच्छा अब मेरे साथ चले चलो, इससे बढ़कर यात्री के लिए सुख कुछ नहीं होगा । प्रभु ! इसी प्रकार जीव भटका हुआ है, यद्यपि लक्ष्य तो आप ही हैं, पर वह आपको भूल गया है । अब तो कृपा करके आप ही आकर उसको ले चलिए, और ले जाकर उसको उसके गाँव तक पहुँचा दीजिए । आप ही मार्गदर्शक बनिए और आप ही मार्ग बनिए तथा आप ही लेकर उसको लक्ष्य तक पहुँचा दीजिए ।
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