Thursday, 8 December 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ............

सारा संसार ब्रह्म है, यह तत्वज्ञान है । लेकिन क्या इसके आधार पर सारे संसार का व्यवहार चलेगा ? जब आप एक-दूसरे से व्यवहार करेंगे तो व्यक्तियों को अलग-अलग मानकर उसकी अलग-अलग योग्यता के अनुसार ही व्यवहार करेंगे और यह जो भेद आप स्वीकार करते हैं, वह जीवन का व्यवहारिक सत्य है, इसकी अपेक्षा है । लेकिन इसके साथ-साथ तत्वज्ञान की भी आवश्यकता है । अर्जुन से भगवान ने कहा - अर्जुन ! विराट रूप देखे बिना यदि तुम लड़कर इन्हें मारते तो तुम्हें अभिमान हुए बिना न रहता कि मैंने इतने बड़े-बड़े योद्धाओं को मार डाला । लेकिन अब अन्तर यह पड़ गया कि यद्यपि तुम लड़ोगे और लोगों की दृष्टि में तुम्हारे द्वारा ही ये मारे भी जायेंगे, लेकिन तुम जिस सत्य का साक्षात्कार कर चुके हो उससे तुम्हें निरन्तर यह बोध बना रहेगा कि नहीं-नहीं, मारने वाले तो प्रभु हैं, मैं तो केवल इस मंच पर मारता हुआ दिखायी दे रहा हूँ । इसलिए दोनों की आवश्यकता है । व्यवहार में तुम लड़ो और आतंरिक रूप से, मैंने जो दृष्टि दी है, उसके द्वारा तुम्हारे कर्तृत्व का अभिमान मिटे, यही साधना और साध्य तत्व का सामंजस्य हैं ।

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