Saturday, 31 December 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

महत्वकांक्षा का पहला रूप सामने यह आया कि विन्ध्याचल ने सूर्य से कहा कि तुम मेरी भी परिक्रमा किया करो, मैं कोई कम हूँ क्या ? सूर्य ने कहा - मैं तो नियम से बँधा हुआ हूँ, इसलिए तुम्हारे कहने से तुम्हारी परिक्रमा नहीं कर सकता । अब देखिए, महत्वकांक्षा में विकृति आ गयी ? सूर्य से प्रकाश लेना एक बात है और सूर्य हमारी परिक्रमा करे, यह दूसरी बात है । अपनी महत्वकांक्षा के लिए हम प्रकाश जीवन में लें और प्रकाश का सदुपयोग करके हम आगे बढें, तब तो हमारी महत्वकांक्षा हमको सही दिशा में ले जायेगी पर अगर हम यह समझने लगें कि प्रकाश हमारे चारों ओर ही चक्कर काटने लगे, इसका अभिप्राय तो यही है कि हम केवल अपने को ही चमकाना चाहते हैं । और उसकी विकृति इस रूप में आ गयी कि जब सूर्य ने अस्वीकार कर दिया तो विन्ध्याचल ने कहा कि अगर तुम मेरी परिक्रमा नहीं करोगे तो तुम्हारे प्रकाश से मैं संसार को वंचित करके अंधकार फैला दूँगा । मात्सर्य का सबसे बुरा रूप यही है ।

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