तीर्थराज प्रयाग में महर्षि भरद्वाज से बड़े ही प्रेम भरे शब्दों में प्रभु ने पूछा कि कृपा करके बताइए कि मैं किस मार्ग से जाऊँ ? भगवान श्रीराघवेन्द्र का यह प्रश्न केवल भौतिक प्रश्न ही नहीं है, क्योंकि भौतिक दृष्टि से प्रभु को मार्ग दिखाने के लिए निषादराज तो साथ में हैं ही, और वैसे भी यमुना के बाद तो प्रभु स्वयं ही यात्रा करते हैं । किन्तु भई ! जो प्रश्न सुनने में बड़ा भौतिक सा प्रतीत होता है, उस छोटे प्रश्न में भगवान राम ने समाज के उस शाश्वत प्रश्न को दोहराया है जो जीवन पथ में प्रत्येक व्यक्ति के सामने आता है । यद्यपि छोटी-मोटी शरीरगत यात्राएँ तो हमारे और आपके जीवन में न जाने कितनी होती हैं, पर अगणित जन्मों में जीव की एक यात्रा चल रही है । किन्तु विडम्बना यह है कि जहाँ सांसारिक यात्रा में व्यक्ति क्रमशः लक्ष्य के समीप पहुँच जाता है, वहाँ आन्तरिक जीवन में वह लक्ष्य से दूर होता जा रहा है । आनन्द की जैसी अनुभूति व्यक्ति को जीवन के प्रारम्भिक क्षणों में होती रहती थी, आगे बढ़ता हुआ वह इससे वंचित हो जाता है । इसका क्या कारण है ? यदि यह प्रश्न किसी से किया जाय तो इसका सांकेतिक उत्तर यही है कि यदि समय अधिक लग रहा हो, किन्तु उसके बाद भी अगर हम अपने घर के पास नहीं पहुँच रहे हैं तो इसका सरल सा अर्थ यही है कि सही मार्ग से भटक गये होंगे । क्योंकि सही मार्ग पर चलने का एक स्पष्ट प्रमाण यह है कि समय बीतने के साथ-साथ हम अपने गन्तव्य के निकट तक पहुँचेंगे । किन्तु यात्रा में केवल चलने मात्र से काम नहीं चलेगा अपितु सही मार्ग का निर्धारण भी आवश्यक है । क्योंकि सही मार्ग पर अगर न चला तो स्वाभाविक रूप से व्यक्ति भटककर अपने लक्ष्य से दूर होता जायेगा ।
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