Wednesday, 14 December 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी ने कल्पना की कि यात्री को यह चिंता रहती है कि अगर हम पैदल चलेंगे तो कष्ट होगा । अतः व्यक्ति यह चाहता है कि ढोने वाला यदि कोई दूसरा मिल जाय और दूसरे के कन्धे पर बैठकर अगर हम चल सकें तो इससे बढ़िया बात क्या होगी ? प्राचीन काल में जब अन्य सवारियाँ नहीं थीं तब गाँव में एक छोटी सी खाट को बाँस के आधार पर लटकाकर उसमें आदमी को बैठाकर ढोया जाता था । गोस्वामीजी ने बताया कि जीव तो यात्री है, और उसका शरीर डोली है । यह जीव (आत्मतत्व) शरीर की डोली में बैठकर यात्रा कर रहा है । किसी ने कहा, यह तो बड़े आनन्द की बात हो गयी कि जीव को डोली में बैठकर यात्रा करनी है । तो गोस्वामीजी ने कहा - यह डोली कैसी है, उठाने वाले कहार कैसे हैं, पहले इसका पूरा परिचय तो आप पढ़ लीजिए । डोली कैसी है ? तो आपने देखा होगा कि जो डोली बनायी जाती है, उसमें बाँस ऐसा लगाया जाता है कि जो सड़ा हुआ न हो, अन्यथा बेचारा यात्री बाँस के टूट जाने से गिर जायेगा । पर यहाँ पर जीव ने जो डोली बनायी है उसका बाँस कैसा है ? गोस्वामीजी ने कहा - बाँस पुराना और सड़ा हुआ है और खटोला जो है वह तिकोना है । चौकोर हो तो आराम मिले, पर जब तिकोना होगा तो व्यक्ति पैर भी ठीक से फैला नहीं सकेगा । इसका अभिप्राय है कि सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण का यह तिकोना खटोला है । और शरीर ऐसा मिला हुआ है, जैसे सड़ा हुआ बाँस, कब कहाँ से टूट जाय, इसका कोई ठिकाना नहीं; इसी प्रकार से शरीर का कौन-सा अंग कब रोगी हो जाये इसे कौन कह सकता है ? किसी ने गोस्वामीजी से कहा - महाराज ! अगर डोली पर ही चलना है तो बढ़िया डोली पर क्यों नहीं चल रहे हैं ? तुलसीदासजी ने कहा भई ! डोली अगर अपने द्वारा बनवायी गयी हो तब तो हम अपने मन की बनवायेंगे, पर किसी ने दान में दी हो तो फिर अपने मन के अनुरुप बनवाने का प्रश्न ही नहीं है । तो जीव को यह जो डोली मिली हुई है, वह बेचारे की स्वयं की इच्छा से नहीं बनी है बल्कि यह तो दान की है । तो किसने दिया है दान ? बोले - करमचंद ने यह डोली दान में दी है । इसका अभिप्राय है कि व्यक्ति ने जैसे कर्म किये वैसा ही शरीर मिल गया, अब शरीर का परिवर्तन तो हो ही नहीं सकता ।

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