Thursday, 15 December 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

विनय-पत्रिका में गोस्वामीजी कर्म के साथ बहुधा एक शब्द जोड़ दिया करते हैं और वह शब्द है - कुटिल । जीवन-यात्रा के इस पद में कुटिल के साथ करम में चंद और जोड़कर कुटिल करमचंद नाम बना दिया उन्होंने । यह नहीं कहा कि कर्म से डोली मिली है बल्कि यह कहा कि कुटिल करमचंद ने इसे दिया है । यह दानी का नाम है । तो महाराज ! आप दानी को कुटिल क्यों कह रहे हैं ? उन्होंने कहा - भई ! दानी ऐसी वस्तु दे कि जिसे पाकर पाने वाले को सुख मिले, तब तो वह बड़ा उदार दानी है । पर यदि ऐसी वस्तु दे जिसे पाने वाला जीवन भर उसे ढोते-ढोते मर जाय, दुख ही दुख पाता रहे, तब तो सचमुच वह बड़ा कुटिल दानी है । करमचंदजी ने शरीर तो दे दिया पर शरीर हम लोगों को ढो रहा है, या हम शरीर को ढो रहे हैं । दिन-रात जो चेष्टा चल रही है, वह शरीर की सेवा है, या शरीर द्वारा आत्मा की सेवा हो रही है, तो भई ! शरीर की सेवा पाकर जीव को यदि सुख मिले तब तो इसे पाने का आनन्द है, पर हमें दिखायी यह देता है कि जीव शरीर की सेवा में लगा हुआ है ।

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