भगवान कृष्ण ने ज्ञानमयी दृष्टि अर्जुन को दी तथा अर्जुन ने उस ज्ञानमयी दृष्टि से जब भगवान का विराट रूप देखा तो उसे दिखायी पड़ा कि भीष्म, कर्ण, द्रोण आदि जितने भी योद्धा हैं वे सब के सब भगवान के विराट के मुख में मरे हुए पड़े हैं । अर्जुन से भगवान पूछते हैं कि अर्जुन ! ये जो तुम्हें मरे हुए दिखाई दे रहे हैं वे तुम्हें अपनी आँखों से दिखाई दे रहे हैं या मैंने जो आँखें दी हैं उनसे दिखाई दे रहे हैं ? अर्जुन ने कहा - महाराज ! आपने जो आँखें दी हैं, उनसे ऐसा लग रहा है । भगवान ने कहा - अर्जुन ! मेरी दी हुई आँखों से जो दिखाई दे रहा है वही जब तुम्हारी आँखों से दिखाई देने लगे, तब तो बात पूरी होगी नहीं तो बात अधूरी रहेगी । जब मुझे दिखाई दे और तुम्हें न दिखाई दे तब तक पूर्णता नहीं है । फिर यदि चाहते तो अर्जुन भी यही बात कह सकते थे कि आपने विराट रूप दिखाया ही क्यों ? तो भगवान ने एक महत्वपूर्ण सूत्र देते हुए कहा - अर्जुन ! विराट रूप मैंने दिखाया केवल कर्तव्य का अभिमान मिटाने के लिए, साधन मिटाने के लिए नहीं दिखाया है । सचमुच यह बहुत ही गंभीर सूत्र है । इसका अभिप्राय है कि कर्तव्य के अभिमान का मिटना तो जीवन में परमावश्यक है, पर कर्तृत्व के अभिमान के मिटने का परिणाम कहीं यह न हो जाय कि व्यक्ति साधन ही करना बन्द कर दे, पुण्य और सत्कर्म करना भी बन्द कर दें । इसलिए जब भी साध्य तत्व से उतरकर साधना में आवें तब हमें जीवन में असीम दृष्टि के स्थान पर ससीम दृष्टि बनानी पड़ेगी, तभी हम व्यवहार चला पायेंगे ।
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