Thursday, 1 December 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

 ....कल से आगे .....
भगवान राम ने मनुष्य के समान आचरण करते हुए हमें और आपको संकेत दिया कि जब कभी जीवन में मार्ग की समस्या आये तो हम क्या करें ? प्रभु से पूछा गया कि पहले कभी आपने यह प्रश्न क्यों नहीं किया ? प्रभु ने कहा - भई ! पहली यात्रा में तो गुरु विश्वामित्र साथ थे, इसलिए हमें मार्ग ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं थी । पर इस समय हमें मार्ग दिखाने वाले की आवश्यकता है । भगवान कहते हैं - जब कभी जीवन में द्विविधा आये, मार्ग के विषय में कोई प्रश्न उत्पन्न हो, तो त्रिवेणी के तट पर चले जाइए और भरद्वाज को ढूँढ़िये, तथा त्रिवेणी के तट पर भरद्वाज जी से जिज्ञासा कीजिए कि जीवन का मार्ग कौन-सा है ? महर्षि बाल्मीकि के आश्रम में पहुँच जाइये और उनसे प्रश्न पूछिये कि जीवन का लक्ष्य क्या है ? अभिप्राय यह है कि प्रभु श्रीराम की ईश्वर के रूप में पूजा कीजिए, मनुष्य के रूप में उनके चरित्र को ह्रदयंगम कीजिये । भगवान राम ईश्वरत्व और मनुष्यत्व के बीच में सेतु हैं । ईश्वर हैं, ठीक है, लेकिन ईश्वर होने से ही काम हीं बना इसलिए मनुष्य बने । और मनुष्य हैं, यह भी अधूरी बात है क्योंकि उसमें भी ईश्वर के बिना पूर्णता नहीं है । भगवान राम और तत्वज्ञ मुनि में जो मीठा वार्तालाप हुआ इस प्रश्न को लेकर, तथा इसका जो समाधान दिया गया उसकी चर्चा हम आगे करेंगे ।

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