जीवन पथ में सही मार्ग के निर्धारण के संदर्भ में देवर्षि नारद के प्रसंग में एक बड़ी व्यंग्यात्मक बात आती है । देवर्षि नारद विश्वमोहिनी को पाने के लिए जब व्यग्र हो जाते हैं तब उनमें कामना का उदय होता है । हम यों कह सकते हैं कि उस प्रसंग का उद्देश्य श्रेष्ठ व्यक्ति के जीवन में भी भटकाव आने की सम्भावना की ओर संकेत करना है । विश्वमोहिनी का सौन्दर्य देखकर नारद उसे पाने के लिए व्यग्र हो जाते हैं । पर जब वे उसे पाने की चेष्टा में सफल नहीं होते, तब उनके अन्तःकरण में अत्यंत क्रोध उत्पन्न होता है । यद्यपि देवर्षि नारद के जीवन की तो यह क्षणिक गाथा है, पर हमारे और आपके जीवन का यह निरन्तर घटित होने वाला सत्य है । मानसिक मनोभाव एक के बाद दूसरे कैसे आते हैं इसको ओर संकेत करते हुए गीता में भगवान कृष्ण ने कहा कि संग से जब कामना उत्पन्न होती है तो उसके दो परिणाम होते हैं यदि कामना की पूर्ति हो जाय तो व्यक्ति के जीवन में लोभ बढ़ेगा और यदि कामना की पूर्ति में बाधा पड़े तो व्यक्ति को क्रोध आयेगा । वैसे गीता में उसे लोभ का नाम नहीं दिया गया, केवल यही कहा गया कि संग से कामना उत्पन्न होती है और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है । लोभ को छोड़ देने का महत्वपूर्ण तात्पर्य यह है कि कामना के बाद मनुष्य को क्रोध आये बिना रहेगा ही नहीं । क्योंकि कामना के बाद मनुष्य का लोभ बढ़ेगा और कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता जिसके जीवन में सम्पूर्ण लोभ की पूर्ति हो जाय । इसलिए भगवान कृष्ण ने यह कहना ज्यादा उचित माना कि संग से कामना और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है । देवर्षि नारद के प्रसंग में हमें इसी क्रम का परिचय मिलता है ।
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