भगवान राम अयोध्या से सभी बन्दरों को वस्त्राभूषण पहना कर जब विदा करते हैं, उस समय अन्य बन्दर तो चले गये परन्तु अंगद बैठे रह गये । और जब अंगद जी बैठे रहे तो प्रभु नहीं बोले । क्योंकि अपनी ओर से किसी से जाओ कहना तो ठीक नहीं है । इसलिए प्रभु ने कुछ नहीं कहा । लेकिन अंगद ही से त्रुटि हो गई । क्योंकि यदि वे बैठे रहे थे तो फिर बैठे ही रह जाते । पर वे बैठे नहीं रह पाये । अंगद ने जब देखा कि सब चले गये तो वे अचानक भगवान के पास आ गये । उस समय भगवान अगर पूछते कि अंगद तुम क्यों नहीं गये तब तो वे बातें समझ में आती जो अंगद ने कही । यद्यपि प्रभु ने अपनी ओर से नहीं पूछा कि - अंगद तुम क्यों नहीं गये ? पर अंगद अपनी ओर से ही बोल पड़े । इसमें उनकी मानसिक दुर्बलता दिखायी दे गयी । उनके मन में कहीं न कहीं यह भय था कि कहीं ऐसा न हो जाय कि भगवान बाद में मुझे भेज ही दें । इसीलिए अभी से निर्णय हो जाय कि रहना है या जाना है । अगर जाना ही है तो जब सब साथी जा रहे हैं उन्हीं के साथ हम भी चले जायँ । इनका साथ क्यों छूटे ? भगवान समझ गये कि अभी बैठने की अडिगता वाली वृत्ति इनमें नहीं है ।
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