Tuesday, 31 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान राम अयोध्या से सभी बन्दरों को वस्त्राभूषण पहना कर जब विदा करते हैं, उस समय अन्य बन्दर तो चले गये परन्तु अंगद बैठे रह गये । और जब अंगद जी बैठे रहे तो प्रभु नहीं बोले । क्योंकि अपनी ओर से किसी से जाओ कहना तो ठीक नहीं है । इसलिए प्रभु ने कुछ नहीं कहा । लेकिन अंगद ही से त्रुटि हो गई । क्योंकि यदि वे बैठे रहे थे तो फिर बैठे ही रह जाते । पर वे बैठे नहीं रह पाये । अंगद ने जब देखा कि सब चले गये तो वे अचानक भगवान के पास आ गये । उस समय भगवान अगर पूछते कि अंगद तुम क्यों नहीं गये तब तो वे बातें समझ में आती जो अंगद ने कही । यद्यपि प्रभु ने अपनी ओर से नहीं पूछा कि - अंगद तुम क्यों नहीं गये ? पर अंगद अपनी ओर से ही बोल पड़े । इसमें उनकी मानसिक दुर्बलता दिखायी दे गयी । उनके मन में कहीं न कहीं यह भय था कि कहीं ऐसा न हो जाय कि भगवान बाद में मुझे भेज ही दें । इसीलिए अभी से निर्णय हो जाय कि रहना है या जाना है । अगर जाना ही है तो जब सब साथी जा रहे हैं उन्हीं के साथ हम भी चले जायँ । इनका साथ क्यों छूटे ? भगवान समझ गये कि अभी बैठने की अडिगता वाली वृत्ति इनमें नहीं है ।

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