हनुमान जी से प्रभु ने लेन-देन की बात नहीं की । क्योंकि जानते हैं कि हनुमान जी देना ही देना जानते हैं । लेने का तो प्रश्न ही नहीं है इनके जीवन में । इसलिए इनसे लेन-देन की बात क्यों करें ? और सचमुच एक महान व्यक्तित्व है हनुमान जी का । हनुमान जी के लिए शब्द आता है कि वे ज्ञानियों में अग्रगण्य हैं । तो ज्ञानी का लक्षण क्या है ? इस संबंध में रामायण में एक बड़ा सुन्दर सूत्र देते हुए कहा गया है कि - ग्यान मान जहँ एकहु नाहीं । प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको कुछ न कुछ मान बैठा है कि मैं यह हूँ, मैं यह हूँ । और जो व्यक्ति इस प्रकार की मान्यताओं से घिरा हुआ है वह अभिमानी है तथा जो इन मान्यताओं से ऊपर उठ गया वह अभिमान से मुक्त हो गया । क्योंकि जो व्यक्ति कोई मान्यता मान लेगा वह इस प्रकार का अभिमान पाले बिना नहीं रहेगा । हम लोगों के जीवन में बहुधा यही होता है कि जो मान्यताएँ हम मानते हैं उसका लाभ कम लेते हैं और उसकी हानि अधिक उठाते हैं । आप चाहे जो मानिये अपने आपको । चाहे देश के अभिनिवेश से मानिये, चाहे मनुष्यत्व के अभिनिवेश से मानिये, चाहे वर्ण के अभिनिवेश से मानिये, पर होना यह चाहिए कि हम उसका सदुपयोग करें, दुरूपयोग न करें । वर्ण धर्म का जो सर्वश्रेष्ठ उपयोग है व्यक्ति उसे अपने जीवन में स्वीकार करे तथा उसका जो अभिमानमूलक पक्ष है उसका त्याग करे । जैसे ब्राह्मणत्व के द्वारा अगर हमारे जीवन में विवेक का उदय हो, तब तो वह ब्राह्मणत्व का सदुपयोग हुआ । पर अगर ब्राह्मणत्व के द्वारा व्यक्ति के जीवन में अभिमान की इतनी वृद्धि हो जाय कि वह सबको तुच्छ तथा अपने आपको बड़ा मानने लगे तो इसका अभिप्राय हुआ कि उसकी जो मान्यता थी वह उसके लिए कल्याणकारी नहीं रही ।
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