Tuesday, 23 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान श्रीराम वन में यद्यपि उदासी वेष में गये किन्तु धनुष-बाण अवश्य लेते गये । वैसे दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं । पर भगवान राम का तात्पर्य यह था कि हम अपने स्वार्थ के लिए तो उदासीन हो सकते हैं, अपने लिए राज्यप्राप्ति के उद्देश्य से हम नहीं लड़ेंगे, इसलिए उदासी बनकर जा रहे हैं । लेकिन मैं यह प्रतिज्ञा नहीं करता हूँ कि जब समाज पर संकट आवेगा, तब भी नहीं लड़ूँगा, अपितु जब कभी ऐसा अवसर दिखायी दिया तब तो मैं धनुष-बाण उठाकर अवश्य संघर्ष करुँगा । भगवान श्रीराघवेन्द्र की दृष्टि में व्यक्ति के जीवन में सन्तत्व एवं स्थित प्रज्ञता दोनों का सामंजस्य होना चाहिए । किन्तु उस सामंजस्य का रूप यही होना चाहिए कि आप अपने संदर्भ में स्थितप्रज्ञ बन जाइये और दूसरों के लिए सन्त । अपनी पीड़ा से विचलित मत होइए, पर जब दूसरों की पीड़ा देखिये तब आपका ह्रदय द्रवित हुए बिना न रहे । भगवान राम के चरित्र में पग-पग पर यही तो दिखायी देता है ।

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