तुलसीदास जी ने वन पथ में भगवान श्रीराम, श्रीसीताजी और लक्ष्मण जी के चलने की पद्धति का वर्णन करते हुए कहा कि -
प्रभु पद रेख बीच बिच सीता ।।
धरति चरन मग चलति सभीता ।।
- इसका सांकेतिक अभिप्राय है कि प्रभु के चरणों में जो चार रेखायें हैं वे मानो चार मर्यादाएँ हैं जो भगवान श्रीराघवेन्द्र ने चार रेखाओं के माध्यम से बनायी । श्रीसीताजी ने निरन्तर उन चारों रेखाओं की रक्षा करने की चेष्टा की, मर्यादाओं को बचाने की चेष्टा की । इसके द्वारा श्रीजानकी जी ने हमें सावधान कर दिया कि प्रभु की रेखाओं को मैंने कभी नहीं लाँघा, पर लक्ष्मण की रेखा को मैं लाँघ गयी इसी कारण से मुझे लंका में कैद होना पड़ा । इसका अभिप्राय है कि चाहे कोई बड़ा हो और चाहे छोटा हो पर उसकी रेखा (मर्यादा) को कभी मत लाँघिये । बड़ों का सम्मान तो कीजिए ही, किन्तु छोटे के प्यार की भी रक्षा कीजिए ।
प्रभु पद रेख बीच बिच सीता ।।
धरति चरन मग चलति सभीता ।।
- इसका सांकेतिक अभिप्राय है कि प्रभु के चरणों में जो चार रेखायें हैं वे मानो चार मर्यादाएँ हैं जो भगवान श्रीराघवेन्द्र ने चार रेखाओं के माध्यम से बनायी । श्रीसीताजी ने निरन्तर उन चारों रेखाओं की रक्षा करने की चेष्टा की, मर्यादाओं को बचाने की चेष्टा की । इसके द्वारा श्रीजानकी जी ने हमें सावधान कर दिया कि प्रभु की रेखाओं को मैंने कभी नहीं लाँघा, पर लक्ष्मण की रेखा को मैं लाँघ गयी इसी कारण से मुझे लंका में कैद होना पड़ा । इसका अभिप्राय है कि चाहे कोई बड़ा हो और चाहे छोटा हो पर उसकी रेखा (मर्यादा) को कभी मत लाँघिये । बड़ों का सम्मान तो कीजिए ही, किन्तु छोटे के प्यार की भी रक्षा कीजिए ।
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