Thursday, 18 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

तुलसीदास जी वनपथ की झाँकी का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि आगे-आगे श्रीराम चल रहे हैं, उनके पीछे श्री सीताजी डरे हुए भाव से श्रीराम की चरण-रेखा को बचाती हुई चलती हैं । तथा सबसे अन्त में श्री लक्ष्मण जी सावधान होकर सीता जी और भगवान राम को थोड़ा दाहिने करके चलते हैं, ठीक पीछे नहीं चलते हैं । इसका तात्पर्य है कि व्यक्ति को मार्ग में चलते हुए सावधान तो रहना चाहिए, किन्तु ठीक पीछे चलने की आदत कभी-कभी समस्या उत्पन्न कर देती है । महापुरुषों का बिल्कुल सीधा अनुगमन नहीं करना चाहिए । उनको जरा दाहिने करके चलिये । जीवन यात्रा में हम कभी न अटकें इसके लिए श्रीराम को आगे करके ही चलना चाहिए । यद्यपि हम लोग भी श्रीराम को मानते हैं, पर एक अन्तर है । हम लोग वैसे पुकारते तो हैं राम को, पर प्रश्न यह है कि हम ईश्वर के पीछे चलना चाहते हैं या ईश्वर को अपने पीछे चलाना चाहते हैं ? और हम लोगों की समस्या यह है कि हम ईश्वर को भी पीछे चलाना चाहते हैं, ईश्वर के पीछे चलना नहीं चाहते । दूसरी महत्वपूर्ण बात है - रेखाओं को बचाना । इसका अभिप्राय है कि श्रीराम ने अवतार लेकर जो रेखायें  (मर्यादायें) बना दीं, हम उन मर्यादाओं को मानते हैं कि नहीं ? श्री लक्ष्मण जी और श्री सीता जी एक-एक पग डर कर उठा रहे हैं कि कहीं कोई रेखा मिट न जाय । इसका अर्थ है कि संसार पथ में यदि ईश्वर आगे रहे, हम उनकी मर्यादा का ध्यान रखें और ईश्वर का भय बना रहे, तो फिर भटकने की कोई संभावना नहीं है ।

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