अयोध्याकाण्ड में एक बड़ा अनोखा प्रसंग आता है । चित्रकूट से लौटकर श्री भरत अयोध्या आये और गुरु वसिष्ठ के चरणों में प्रणाम करके बोले - गुरुदेव मेरे मन में एक संकल्प है अगर वह शास्त्र के विरूद्ध न हो, तो मैं उसका पालन करुँ और महाराज ! शास्त्र की व्याख्या और निर्णय तो आप ही करेंगे । गुरु वसिष्ठ ने पूछा - क्या चाहते हो ? श्रीभरत ने कहा कि मैं सोचता हूँ कि अयोध्या के राज्य सिंहासन पर प्रभु की पादुकाओं को बैठा दूँ, और मैं नन्दिग्राम में रहकर वहीं से प्रभु के राज्य की सेवा करुँ । उस समय गुरु वसिष्ठ ने कोई ग्रन्थ खोलकर उसमें नहीं देखा कि श्रीभरत का यह संकल्प शास्त्र अथवा वेद के अनुकूल है या नहीं । अपितु उन्होंने तुरन्त कहा - भरत ! मैं अब धर्म का निर्णय किसी शास्त्र या किसी ग्रन्थ से नहीं करुँगा, बल्कि मैंने तो धर्म का निर्णय करने के लिए एक सूत्र पा लिया है । इसलिए अब जो भी निर्णय करना होगा, उसी सूत्र के अनुसार करुँगा । श्रीभरत ने कहा - महाराज ! कौन सा सूत्र आपको मिल गया ? गुरु जी ने कहा - भरत ! तुम जो समझोगे, तुम जो कहोगे और तुम जो करोगे, मैं समझ जाऊँगा कि बस वही धर्म का सार है । इसका अभिप्राय है कि जिसके जीवन में धर्म के प्रति द्वन्द्व है, वहाँ तो विधि-निषेध संबंधी विचार की आवश्यकता है । लेकिन जहाँ पर शुद्धप्रेम का उदय हो गया है वहाँ बाह्य नियंत्रण अथवा विधि-निषेद की कोई आवश्यकता नहीं है ।
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