समुद्र को पार करने के लिए पत्थर के साथ-साथ भगवान ने जो दूसरा पुल बनाया वह भक्ति मार्ग का पुल है, पर डर यह है कि चलते समय अगर कहीं समुद्र में गिर गये तो जलचर उठाकर खा जायेंगे । और वस्तुतः ये जलचर ही हमारे जीवन के दुर्गुण हैं तथा सद्गुण ही पत्थर हैं । और पत्थर तथा जलचर दोनों के द्वारा पुल बनाकर मानो भगवान ने बता दिया कि कर्म मार्ग माने सद्गुणों का सदुपयोग, और भक्ति मार्ग का तात्पर्य है दुर्गुणों का सदुपयोग । सचमुच जलचर तो ऐसे थे कि जो बन्दरों को गिरने पर उठाकर खा लेते, पर जब उन्होंने भगवान की सुन्दरता देखी तो देखते ही रह गये । इसका अभिप्राय है कि जितनी भी दोष-वृत्तियाँ हैं, उनको भगवान से जोड़ दीजिए । जब ये भगवान में लग जायेंगी तो इनका भी सदुपयोग हो जायेगा । यह भक्ति मार्ग है, भगवत् कृपा का मार्ग है ।
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