जैसे कोई सीढ़ी लगी हुई है, तो यद्यपि सीढ़ी की बड़ी महिमा है, क्योंकि अगर सीढ़ी न हो तो व्यक्ति ऊपर नहीं उठेगा, लेकिन प्रश्न यह है कि व्यक्ति छत पर पहुँचने के पश्चात सीढ़ी का परित्याग कर देगा कि सीढ़ी पर ही खड़ा रहेगा ? इसका सीधा सा अर्थ है कि सीढ़ी चाहे कितनी भी बढ़िया क्यों न हो, किन्तु छत पर पहुँच जाने पर आपको सीढ़ी को छोड़ना ही पड़ेगा । भगवान कहते हैं कि इसी प्रकार वेदों के द्वारा तुम सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण का सदुपयोग करो और इसके पश्चात इन तीनों से ऊपर उठने की चेष्टा करो । जैसे किसी व्यक्ति को जल की आवश्यकता है तो उसे जल का सेवन करना अनिवार्य है । क्योंकि जल के बिना प्यास नहीं बुझाई, तृप्ति नहीं होगी । लेकिन जैसे तृप्ति का अनुभव कर लेने के बाद तत्काल उसे जल की अपेक्षा नहीं रह जाती है, ठीक उसी प्रकार से वेद के द्वारा व्यक्ति कैसे तमोगुण से उठकर रजोगुण में जाय, और रजोगुण से सतोगुण में जाय, इसका विस्तृत वर्णन किया गया है । लेकिन उसके बाद इन तीनों से ऊपर उठकर इनके भी परे हो जाने की आवश्यकता है । इसी का संकेत सूत्र रामचरितमानस में प्राप्त होता है ।
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